
Agricultural Loan Waivers in India
एक आश्चर्यजनक वित्तीय विरोधाभास के तहत, तमिलनाडु सरकार ने किसानों के लिये ₹75,000 तक के सहकारी फसल ऋण को पूरी तरह से माफ करने की घोषणा की है, हाल ही में जारी उसके राजकोषीय प्रबंधन संबंधी श्वेत पत्र से यह उजागर हुआ है कि राज्य पर ₹13.18 लाख करोड़ का बढ़ता ऋण भार है।
- इस विकास ने कल्याण-आधारित हस्तक्षेपों, जैसे कृषि ऋण माफी और दीर्घकालिक राजकोषीय अनुशासन की अनिवार्यता के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस को फिर से तेज़ कर दिया है।
भारत में कृषि ऋण माफी को लेकर क्या चिंताएँ हैं?
- राजनीतिक अर्थव्यवस्था बनाम वास्तविक संकट: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के आंतरिक कार्य समूह (वर्ष 2019) ने ऋण माफी की समय-सीमा और राज्य चुनाव चक्रों के बीच उच्च सहसंबंध को रेखांकित किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि इन्हें प्रायः राजनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है, न कि केवल जलवायु-जनित या बाज़ार-प्रेरित कृषि संकटों की प्रतिक्रिया के रूप में।
- बहिष्करण त्रुटि: ऋण माफी योजनाएँ स्वाभाविक रूप से केवल उन लोगों को लाभ पहुँचाती हैं जिनकी औपचारिक ऋण (संस्थागत उधारी) तक पहुँच होती है।
- पट्टेदार किसान, भूमिहीन मज़दूर और बटाईदार जैसे हाशिये पर रहने वाले समूह (जो अत्यधिक ब्याज दरों पर अनौपचारिक साहूकारों पर बहुत अधिक निर्भर हैं), इन लाभों से पूर्णतः वंचित रह जाते हैं।
- नैतिक जोखिम की समस्या: बार-बार की जाने वाली ऋण माफी ऋण संस्कृति को क्षीण करती है और नैतिक जोखिम की स्थिति उत्पन्न करती है जिसमें नियमित रूप से अपने ऋण का भुगतान करने वाले ईमानदार किसान स्वयं को दंडित महसूस करते हैं, इसके विपरीत जानबूझकर ऋण अदायगी से बचने वाले लाभान्वित हो जाते हैं, जो आगे चलकर ऋण माफी की उम्मीद में रणनीतिक डिफॉल्ट को प्रोत्साहित करता है।
राज्य के वित्त और अर्थव्यवस्था पर ऋण माफी का असर
- उच्च ऋण-टू-GDP अनुपात: राज्यों का बकाया कर्ज वर्तमान में GDP के 27-29% के स्तर पर बना हुआ है, जो राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) समीक्षा समिति (2019) द्वारा अनुशंसित 20% के मानक से काफी अधिक है।
- पूंजीगत व्यय का प्रभावित होना/क्राउडिंग आउट: राज्य सरकारें FRBM की सीमाओं (जिसके तहत राजकोषीय घाटे को GSDP के 3% पर सीमित किया गया है) से बंधी हुई हैं।
- अचानक होने वाले ऋण माफी के खर्चों (जिन्हें राजस्व व्यय के रूप में वर्गीकृत किया जाता है) को पूरा करने के लिये, राज्य अनिवार्य रूप से पूंजीगत परिव्यय में कटौती करते हैं।
- ऋण माफी योजनाओं को अक्सर पूंजीगत व्यय में लगभग एक-तिहाई (1/3rd) की कटौती करके पूरा किया जाता है। यह कृषि क्षेत्र को सिंचाई नेटवर्क, ग्रामीण कनेक्टिविटी और कोल्ड स्टोरेज चेन जैसी महत्त्वपूर्ण, दीर्घकालिक संपत्तियों के निर्माण (long-term asset creation) से वंचित करता है।
- राजस्व घाटे की गंभीर स्थिति: ऋण माफी हेतु संसाधन जुटाने की प्रक्रिया अक्सर राज्यों को राजस्व घाटे की स्थिति में पहुँचा देती है। जब राज्य बार-बार होने वाले अथवा गैर-पूंजीगत व्ययों के वित्तपोषण हेतु ऋण लेते हैं, तो इससे ऋण-जाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
- राजकोषीय बोझ: इन ऋण माफियों का राजकोषीय बोझ सामान्यतः किसी राज्य की जीएसडीपी (GSDP) के 0.1% से 4.5% के बीच होता है, जिसके तहत बैंकों को किये जाने वाले भुगतान 3 से 5 वर्षों की अवधि में वितरित कर दिये जाते हैं, जिससे भविष्य के बजटीय समायोजन की क्षमता पर गंभीर सीमाएँ उत्पन्न हो जाती हैं।
- बजट-बाह्य उधारी: कठोर FRBM सीमाओं से बचने के लिये राज्य अक्सर विशेष प्रयोजन वाहनों (SPVs) अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के माध्यम से अपारदर्शी बजट-बाह्य उधारी का सहारा लेते हैं, परिणामस्वरूप राज्य की वास्तविक देनदारियों का परिमाण अस्पष्ट हो जाता है।
- गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) में वृद्धि: ऋण माफी का प्रावधान किसानों में भविष्य में ऋण राहत की उम्मीद के कारण रणनीतिक डिफॉल्ट की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। जिससे ऋण देने वाली संस्थाओं की वित्तीय स्थिति कमज़ोर हो जाती है। परिणामस्वरूप जिन राज्यों ने कृषि ऋण माफी की घोषणा की है, वहाँ ऐतिहासिक रूप से कृषि ऋणों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।

कृषि ऋण माफी के क्या विकल्प हैं?
- प्रत्यक्ष आय सहायता: पीएम-किसान (PM-KISAN – प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि) जैसी योजनाएँ या राज्य स्तरीय पहल जैसे ओडिशा की कालिया (KALIA) और तेलंगाना की रयथु बंधु (Rythu Bandhu) अधिक न्यायसंगत और समान हैं।
- ये योजनाएँ ऋण पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित किये बिना, पट्टेदार किसानों सहित सभी किसानों को निर्बाध प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण उपलब्ध कराती हैं।
- सुलभ संस्थागत ऋण: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जैसी योजनाओं के माध्यम से कम ब्याज वाले कृषि ऋण का विस्तार किया जाना चाहिये। इससे ऊँची ब्याज दरों वाले अनौपचारिक साहूकारों पर किसानों की निर्भरता कम होती है।
- मूल्य प्राप्ति और बाज़ार सुधार: राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) प्लेटफॉर्म को मज़बूत करना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर विकेंद्रीकृत और समय पर खरीद सुनिश्चित करना तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को बढ़ावा देना, किसानों की मोलभाव करने की शक्ति और उनकी आय के स्तर को बढ़ा सकता है।
- फसल बीमा को सुदृढ़ बनाना: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के दायरे (कवरेज) को बढ़ाना और इसकी भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाना यह सुनिश्चित करता है कि किसान कर्ज के जाल में फँसने से पहले ही जलवायु जोखिमों तथा फसल खराब होने के नुकसान से सुरक्षित हो सकें।
- पूंजीगत बुनियादी ढाँचे में निवेश: पूंजीगत बुनियादी ढाँचे में निवेश: ऋण माफी के बजाय बजटीय संसाधनों को सूक्ष्म सिंचाई (प्रति बूँद अधिक फसल), भंडारण व्यवस्था और कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों की ओर स्थानांतरित करना, कृषि उत्पादकता तथा इसकी संकट-अनुकूलन क्षमता को संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ करेगा।
कृषि ऋण माफी
- कृषि ऋण माफी: एक समष्टि आर्थिक हस्तक्षेप, जिसमें सरकार कृषि ऋणों का दायित्व अपने ऊपर ले लेती है और किसानों की ओर से बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों को ऋण का पुनर्भुगतान करती है।
- उद्देश्य: फसल विफलता, प्राकृतिक आपदाओं या कीमतों में अत्यधिक गिरावट जैसे प्रणालीगत आघातों से उत्पन्न गंभीर कृषि संकट को निम्न करने हेतु इसे एक आपातकालीन राहत उपाय के रूप में लागू किया जाता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ एवं राजकोषीय परिमाण: भारत में कृषि ऋण राहत की प्रवृत्ति समय के साथ विस्तृत केंद्रीकृत योजनाओं से बदलकर एक अधिक विखंडित तथा राज्य-नेतृत्वित मॉडल में विकसित हुई है।
- केंद्रीय पहल: कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना (ARDRS), 1990 के तहत प्रति किसान अधिकतम ₹10,000 तक की राहत प्रदान की गई थी, जिसकी कुल लागत उस समय लगभग ₹10,000 करोड़ आँकी गई थी।
- कृषि ऋण माफी एवं ऋण राहत योजना (ADWDRS), 2008 एक विशाल पूर्व-चुनावी हस्तक्षेप था, जिसकी लागत लगभग ₹52,500 करोड़ थी। इस योजना के तहत विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों (जिनके पास 5 एकड़ तक भूमि थी) को अधिकतम राहत प्रदान की गई थी।
- राज्य-नेतृत्वित वृद्धि:
- ऋण माफी का विकेंद्रीकरण: पिछले एक दशक में कृषि ऋण माफी का दायित्व तीव्रता से राज्य सरकारों की ओर स्थानांतरित हो गया है।
- प्रमुख राज्य: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और तमिलनाडु।
- समग्र राज्य व्यय: वर्ष 2014 के बाद से राज्य-स्तरीय ऋण माफी पर कुल व्यय लगभग ₹2.5 लाख करोड़ तक पहुँच गया है, जो वर्ष 2016-17 की भारत की GDP का लगभग 1.4% है।
- केंद्रीय पहल: कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना (ARDRS), 1990 के तहत प्रति किसान अधिकतम ₹10,000 तक की राहत प्रदान की गई थी, जिसकी कुल लागत उस समय लगभग ₹10,000 करोड़ आँकी गई थी।
- मुख्य समिति की अनुशंसाएँ और संस्थागत रिपोर्टें:
- कृषि ऋण की समीक्षा (2019) हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक आंतरिक कार्य समूह (IWG): IWG ने प्रत्यक्ष आय सहायता योजनाओं की ओर नीति-परिवर्तन करने, पूंजीगत अवसंरचना को सुदृढ़ करने तथा बेहतर मूल्य प्राप्ति हेतु किसानों द्वारा e-NAM पोर्टल के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने की अनुशंसा की।
- कृषि ऋणग्रस्तता पर विशेषज्ञ समूह (2007): इस समूह ने कमज़ोर किसानों तक औपचारिक ऋण की पहुँच बढ़ाने हेतु संयुक्त देयता समूहों (JLG) के माध्यम से ऋण विस्तार की अनुशंसा की।
निष्कर्ष
कृषि ऋण माफी अल्पकालिक, यद्यपि असमान, तरलता राहत प्रदान करती है, परंतु यह भारतीय कृषि की गहरी संरचनात्मक समस्याओं पर केवल एक अल्पकालिक उपचार के समान है। दीर्घकालिक कृषि समृद्धि हेतु नीति-निर्माण को ऋण माफी की लोकलुभावनता से हटकर आय वृद्धि के व्यावहारिक दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होना चाहिये, ताकि राज्य संसाधनों का उपयोग अल्पकालिक चुनावी लाभों के बजाय स्थायी पूंजी निर्माण में किया जा सके।
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