
RBI’s Record Surplus Transfer and Its Implications
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026 के लिये केंद्र सरकार को ₹2.87 लाख करोड़ के रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण को मंज़ूरी दी है, जो पिछले ₹2.11 लाख करोड़ के रिकॉर्ड को पार करता है। यद्यपि यह हस्तांतरण आर्थिक पूंजी ढाँचे (ECF) के अनुरूप है, फिर भी हस्तांतरण का अभूतपूर्व पैमाना भारत की राजकोषीय संरचना में RBI की बदलती भूमिका, केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता तथा राजकोषीय संघवाद पर चर्चा को जन्म दे रहा है।
सारांश
- RBI का रिकॉर्ड ₹2.87 लाख करोड़ का अधिशेष हस्तांतरण भारत की राजकोषीय संरचना में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। यह गैर-कर राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत बनकर राजकोषीय समेकन को समर्थन देता है, ऋण लेने की आवश्यकता को कम करता है तथा पूंजीगत व्यय को बनाए रखने में सहायक होता है।
- हालाँकि RBI की आय पर बढ़ती निर्भरता केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता, राजकोषीय प्रभुत्व, जोखिम बफर में कमी तथा राजकोषीय संघवाद से जुड़े प्रश्न उठाती है, क्योंकि ये हस्तांतरण राज्यों के साथ साझा नहीं होते और विभाज्य कर पूल का हिस्सा भी नहीं होते।
RBI की राजकोषीय भूमिका में संरचनात्मक बदलाव क्या है?
- अप्रत्याशित लाभ (Windfall) से नियमित गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue) की ओर संक्रमण:
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा किया जाने वाला अधिशेष हस्तांतरण अपेक्षाकृत सीमित था, जो लगभग ₹30,000 करोड़ से ₹65,000 करोड़ के बीच रहता था।- वर्ष 2019 के बाद, बिमल जालान समिति की संशोधित आर्थिक पूंजी ढाँचा (ECF) दिशा-निर्देशों के लागू होने के पश्चात ये अधिशेष हस्तांतरण अत्यधिक तेज़ी से बढ़े हैं। वित्त वर्ष 2024 में यह ₹2.11 लाख करोड़ तक पहुँच गया तथा वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर ₹2.87 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया।
- RBI बैलेंस शीट (तुलन-पत्र) का विस्तार: भारतीय रिज़र्व बैंक की राजकोषीय क्षमता उसके बैलेंस शीट के अभूतपूर्व विस्तार से समर्थित है, जो एक वर्ष में 20.6% बढ़कर मार्च 2026 तक ₹91.97 लाख करोड़ तक पहुँच गई।
- इस अवधि में कुल आय में 26% से अधिक की वृद्धि हुई, जिसका प्रमुख कारण विदेशी परिसंपत्तियों का सक्रिय प्रबंधन तथा घरेलू सरकारी प्रतिभूतियों पर प्राप्त प्रतिफल रहा।
- बाधारहित संसाधन सृजन: पारंपरिक राजकोषीय साधनों जैसे कराधान, जिसमें राजनीतिक एवं चुनावी प्रतिरोध होता है अथवा बाज़ार से उधारी, जो निजी निवेश को प्रभावित कर सकता है और ब्याज देनदारी बढ़ाता है; की तुलना में केंद्रीय बैंक से प्राप्त हस्तांतरण बिना किसी प्रत्यक्ष दबाव के व्यापक राजकोषीय स्थान उपलब्ध कराते हैं।
- रिज़र्व प्रबंधन और राजकोषीय प्रतिफल: भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, पूंजी बहिर्वाह तथा अस्थिर कच्चे तेल मूल्यों से निपटने हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार पोर्टफोलियो का नियमित पुनर्संतुलन करता है, जिसमें स्वर्ण की बिक्री तथा विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का अधिग्रहण शामिल है।
- यद्यपि ये उपाय रुपये की स्थिरता बनाए रखने तथा बाज़ार में तरलता सुनिश्चित करने के लिये अपनाए जाने वाले मानक कदम हैं, फिर भी ये विदेशी मुद्रा लेन-देन तथा घरेलू एवं विदेशी प्रतिभूतियों से प्राप्त प्रतिफल के माध्यम से महत्त्वपूर्ण आय उत्पन्न करते हैं, जो अंततः RBI के अधिशेष में उल्लेखनीय योगदान देती है।
आर्थिक पूंजी ढाँचा (ECF)
- परिचय: आर्थिक पूंजी ढाँचा (ECF), बिमल जालान समिति द्वारा तैयार किया गया तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा वर्ष 2019 में अपनाया गया एक संरचित तंत्र है। यह वह प्रणाली है जिसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि RBI को कितने स्तर तक जोखिम बफर बनाए रखने चाहिये और कितना अधिशेष वह सुरक्षित रूप से भारत सरकार को हस्तांतरित कर सकता है। इस प्रकार यह ढाँचा वित्तीय स्थिरता और सरकार की राजकोषीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- उद्देश्य: मौद्रिक एवं विनिमय दर स्थिरता के लिये पर्याप्त वित्तीय बफर बनाए रखना तथा लाभों का पारदर्शी एवं सूत्र-आधारित वितरण सुनिश्चित करना।
- आकस्मिक जोखिम बफर (CRB): ECF यह अनिवार्य करता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपनी कुल बैलेंस शीट के आकार का 4.5% से 7.5% तक आकस्मिक जोखिम बफर (CRB) बनाए रखे, ताकि गंभीर मौद्रिक एवं वित्तीय स्थिरता जोखिमों से अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- रियलाइज़्ड इक्विटी (आकस्मिकता निधि- CF): CF अप्रत्याशित (unforeseen) हानियों के विरुद्ध एक सुरक्षा बफर के रूप में कार्य करता है। ECF के अनुसार इसे RBI की बैलेंस शीट के 5.5% से 6.5% के बीच बनाए रखा जाना चाहिये। इस सीमा से अधिक संचित राशि स्वतः सरकार को हस्तांतरण हेतु मुक्त कर दी जाती है।
- आर्थिक पूंजी (पूंजी और सामान्य जोखिम खाता (CGRA)): यह व्यापक मीट्रिक RBI की समस्त पूंजी, भंडार, जोखिम प्रावधान तथा पुनर्मूल्यांकन शेष को समाहित करता है। इसमें स्वर्ण मूल्य, विदेशी मुद्रा दर और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से हुए लाभ/हानि भी सम्मिलित होते हैं।
- इसे RBI की कुल बैलेंस शीट के 20.8% से 25.4% के बीच बनाए रखा जाना चाहिये।
- समीक्षा चक्र: बदलती वैश्विक व्यापक आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप ढलने के लिये, जालान समिति (2019) ने आर्थिक पूंजी ढाँचे (ECF) की प्रत्येक पाँच वर्ष में आवधिक समीक्षा की अनुशंसा की थी।
- इस ढाँचे की पहली अनिवार्य आवधिक आंतरिक समीक्षा वर्ष 2025 में की गई।

RBI के बढ़ते अधिशेष हस्तांतरण के निहितार्थ क्या हैं?
- राजकोषीय समेकन में सहायता: कई लाख करोड़ रुपये का यह लाभांश केंद्रीय बजट को तत्काल वित्तीय सहारा प्रदान करता है, जिससे सरकार राजकोषीय घाटे को आक्रामक रूप से कम करने में सक्षम होती है और FRBM मानकों को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है, वह भी सार्वजनिक व्यय में कठिन कटौती किये बिना।
- सार्वभौम ऋण दबाव में कमी: गैर-कर राजस्व का उपयोग करके बजटीय घाटों को पूरा करने से सरकार अपने कुल बाज़ार उधारी कार्यक्रम को कम करने में सक्षम होती है।
- यह सीधे सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) पर प्रतिफल को कम करता है, जिससे संपूर्ण घरेलू बैंकिंग प्रणाली में पूंजी की लागत (cost of capital) घट जाती है।
- पूंजीगत व्यय (CapEx) की सुरक्षा: ये गैर-मुद्रास्फीतिकारी संसाधन केंद्र सरकार को वह वित्तीय कुशन (आर्थिक सुरक्षा) प्रदान करते हैं, जिसकी सहायता से वह वैश्विक आर्थिक मंदी के बावजूद भी सड़क, रेलवे और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसी सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं की गति को बनाए रख सकती है।
- ‘भारतीय फिस्कलिज़्म’ परिचालन मॉडल: पश्चिमी केंद्रीय बैंकों के विपरीत, जहाँ स्पष्ट मात्रात्मक सहजता (QE) के तहत निम्नस्तरीय परिसंपत्तियाँ या सरकारी ऋण सीधे खरीदकर केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट पर प्रभाव डाला जाता है, भारत का मॉडल विशिष्ट और भिन्न है। इस व्यवस्था में केंद्रीय बैंक अपनी परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को बनाए रखता है, लेकिन अपने विशाल विदेशी मुद्रा और घरेलू पोर्टफोलियो से प्राप्त उच्च परिचालन प्रतिफल को सीधे संप्रभु सरकार को हस्तांतरित करता है।
RBI के बढ़ते अधिशेष हस्तांतरण से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं?
- संघीय ढाँचे में असंतुलन: अधिशेष हस्तांतरण की संपूर्ण राशि को केंद्र सरकार के लिये ‘गैर-कर राजस्व’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 270 के अनुसार, यह राशि करों के ‘विभाज्य पूल’ (राज्यों के साथ साझा किये जाने वाले कर हिस्से) से पूर्णतः बाहर रहती है।
- परिणामस्वरूप जो राज्य के सख्त ऋण नियमों (अनुच्छेद 293) के अंतर्गत भारत के विकास एवं कल्याणकारी व्यय का 60% से अधिक वहन करते हैं, उन्हें RBI के इस विस्तृत सार्वजनिक क्षेत्रीय अधिशेष (लाभ) में से स्वतः कोई हिस्सा प्राप्त नहीं होता।
- संस्थागत ‘दूरी’ के लिये खतरा: केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता उसकी कार्यपालिका से मानी जाने वाली दूरी पर निर्भर करती है।
- यदि आम बजट में प्रतिवर्ष RBI से बड़े लाभांश की अपेक्षा एक स्थापित प्रवृत्ति बन जाती है, तो इससे रिज़र्व बैंक पर संस्थागत दबाव उत्पन्न होने का खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में RBI का ध्यान मौद्रिक स्थिरता (मुद्रास्फीति नियंत्रण एवं मुद्रा प्रबंधन) से हटकर अपने निवेश पोर्टफोलियो से अधिकतम लाभ अर्जित करने की ओर केंद्रित हो सकता है।
- राजकोषीय प्रभुत्व का जोखिम: लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) ढाँचे के तहत RBI का प्राथमिक काम कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और मूल्य-वृद्धि को नियंत्रित करना है। यह ढाँचा एक कानूनी सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, ताकि देश की मौद्रिक नीति को सरकार की घाटे की भरपाई करने वाली तात्कालिक ज़रूरतों के अधीन न होना पड़े।
- RBI के अधिशेष (सरप्लस) पर सरकार की संरचनात्मक निर्भरता से राजकोषीय प्रभुत्व की स्थिति उत्पन्न हो सकती है—यह एक ऐसा परिदृश्य है जिसमें मौद्रिक नीति के निर्णयों (जैसे ब्याज दरों में वृद्धि या बाज़ार में तरलता प्रबंधन) के साथ सूक्ष्म स्तर पर समझौता होने लगता है, क्योंकि ये निर्णय सीधे तौर पर केंद्रीय बैंक के लाभ और उसके बाद सरकार को दिये जाने वाले लाभांश की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
- प्रणालीगत जोखिम बफर का क्षय: यद्यपि वर्तमान हस्तांतरण ECF के आकस्मिक जोखिम बफर (CRB) के लक्ष्य दायरे में हैं, फिर भी वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी पलायन के समय अधिकतम भुगतान करना RBI की दीर्घकालिक क्षमता को कम करता है, जिससे वह ‘ब्लैक स्वान’ जैसी अप्रत्याशित व्यापक आर्थिक आघातों को बिना सरकार से पुनर्पूंजीकरण लिये अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है।
RBI के अधिशेष हस्तांतरण को लेकर चिंताओं को दूर करने हेतु क्या उपाय आवश्यक हैं?
- परिसंपत्ति निर्माण के लिये निर्धारित करना: सरकार को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अधिशेष लाभांश का उपयोग केवल पूंजीगत व्यय (CapEx) या ऋण पुनर्भुगतान हेतु ही सख्ती से करना चाहिये, न कि आवर्ती राजस्व घाटे या लोकलुभावन सब्सिडी के वित्तपोषण के लिये।
- कर हस्तांतरण ढाँचे की समीक्षा: भविष्य के वित्त आयोगों को केंद्र के पास गैर-विभाज्य राजस्व (जिसमें उपकर, अधिभार और केंद्रीय बैंक के भारी लाभांश शामिल हैं) के बढ़ते अनुपात का मूल्यांकन करना चाहिये ताकि नियमित कर हस्तांतरण प्रतिशत को समायोजित किया जा सके तथा एक निष्पक्ष संघीय संतुलन बनाए रखा जा सके।
- मुख्य शासनादेशों का पूर्णतः पालन: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को अपने पोर्टफोलियो निर्णयों को कड़ाई से सुरक्षित (रिंग-फेंस) रखना चाहिये। परिसंपत्ति आवंटन, विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और सोने का पुनर्संतुलन केवल तरलता, वित्तीय स्थिरता तथा मुद्रास्फीति-नियंत्रण के शासनादेशों से प्रेरित होने चाहिये—लाभ-अधिकतमकरण के उद्देश्यों से कभी नहीं।
- उन्नत पारदर्शिता एवं रिपोर्टिंग: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय को ऐसे उच्च लाभांश भुगतानों की दीर्घकालिक स्थिरता पर स्पष्ट एवं पारदर्शी प्रकटीकरण प्रस्तुत करना चाहिये, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वैश्विक आघातों के विरुद्ध केंद्रीय बैंक का आकस्मिक जोखिम बफर सुदृढ़ बना रहे।
निष्कर्ष
रिकॉर्ड RBI अधिशेष हस्तांतरण सरकारी वित्त को मज़बूत करने में केंद्रीय बैंक की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है। हालाँकि यह राजकोषीय स्थिरता को सुदृढ़ करता है और ऋण लेने के दबाव को कम करता है, फिर भी दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता तथा संतुलित आर्थिक शासन सुनिश्चित करने के लिये केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता एवं राजकोषीय संघवाद की रक्षा करना आवश्यक बना हुआ है।




