
Major overhaul of India’s statistical database
भारत सरकार ने अपने प्रमुख सांख्यिकीय डेटाबेस की समयबद्धता, प्रतिनिधित्व, सटीकता एवं कवरेज में सुधार करने हेतु उनका व्यापक एवं प्रणालीगत उन्नयन किया है।
- डेटा में किये गए ये संशोधन प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों से जुड़े हैं, जो आधारभूत रूप से इस पद्धति में परिवर्तन लाते हैं, जिसके माध्यम से भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP), सकल मूल्य वर्द्धित (GVA), औद्योगिक उत्पादन तथा मूल्य मुद्रास्फीति का आकलन करता है।
सारांश
- भारत ने आर्थिक माप की सटीकता बढ़ाने के लिये बेहतर पद्धतियों, बड़े डेटा स्रोतों और उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की शुरुआत करते हुए, GDP (GDP – 2022-23), IIP (IIP – 2022-23), CPI (CPI – 2024) तथा WPI (WPI – 2022-23) के आधार वर्षों को अद्यतन करके अपने सांख्यिकीय ढाँचे का आधुनिकीकरण किया है।
- इन सुधारों के बावजूद, जनगणना प्रक्रियाओं में देरी, अनौपचारिक क्षेत्र का अपर्याप्त कवरेज, संस्थागत स्वायत्तता पर चिंताएं, रोज़गार के आँकड़ों में विसंगतियाँ और ज़िला स्तर पर विस्तृत आँकड़ों की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी भारत की सांख्यिकीय प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रही हैं।
भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस को अपग्रेड क्यों किया गया है?
- आईएमएफ ‘सी’ ग्रेड चेतावनी: इस कायाकल्प का तात्कालिक संस्थागत कारण 2025 के अंत में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी की गुणवत्ता, प्रतिनिधित्व और समयबद्धता को लेकर जारी की गई ‘सी’ ग्रेड (दूसरी सबसे कम रैंकिंग) की चेतावनी थी।
- अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को बहाल करने और पूंजी बाज़ार में होने वाली विसंगतियों को रोकने के लिये, डेटा फ्रेमवर्क में तेज़ी से सुधार करना एक नीतिगत प्राथमिकता बन गया।
- आधार वर्षों का संरचनात्मक रूप से पुराना होना: वर्ष 2026 के रोलआउट (शुरुआत) से पहले, भारत के प्राथमिक आर्थिक संकेतक 2011-12 के आधार वर्ष पर टिके हुए थे।
- अगले 15 वर्षों में, भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव आया, जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST) के माध्यम से तीव्र हुआ औपचारिककरण (formalization), डिजिटल भुगतान क्रांति और सेवा क्षेत्र के बदलते स्वरूप शामिल हैं। इसके कारण पुराने वर्ष 2011-12 के गणितीय भारांक आधुनिक उत्पादन का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहे थे।
- बदलते उपभोग की वास्तविकताओं के साथ तालमेल: पुराने मुद्रास्फीति बास्केट लगभग एक पीढ़ी पहले के घरेलू खर्च के आँकड़ों के आधार पर कीमतों में होने वाले बदलावों को माप रहे थे।
- पुराने सूचकांकों की कमियाँ: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) जैसे पुराने सूचकांक, जिनका आधार वर्ष 2012 था, अभी भी VCR, कैसेट टेप और पोर्टेबल रेडियो जैसी पुरानी/प्रचलनहीन हो चुकी वस्तुओं पर नज़र रख रहे थे। दूसरी ओर, वे समकालीन उपभोग के तरीकों को पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं कर पा रहे थे, जिनमें ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सेवाएँ, CNG, PNG एवं उच्च-गति इंटरनेट डेटा टैरिफ शामिल हैं।
- मुद्रास्फीति और मूल्यांकन की विसंगतियों को दूर करना: वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की विकास दर के आकलन हेतु सटीक मूल्य सूचकांक अत्यंत बुनियादी एवं आवश्यक होते हैं।
- वास्तविक अर्थव्यवस्था की विकास दर की गणना नाममात्र के आँकड़ों को मुद्रास्फीति के प्रभाव (GDP डिफ्लेटर के माध्यम से) के साथ समायोजित करने के बाद ही की जाती है।
- पुराने हो चुके मुद्रास्फीति बास्केट इस डिफ्लेशन प्रक्रिया को विकृत कर रहे थे, जिससे अर्थव्यवस्था के वास्तविक आकार और विस्तार के संभावित रूप से गलत अनुमान सामने आ रहे थे।
- नीतिगत सटीकता और केंद्रीय बैंक के शासनादेश: व्यापक आर्थिक संकेतक केवल अकादमिक आँकड़े नहीं हैं; वे सीधे तौर पर सरकार की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों का मार्गदर्शन करते हैं। उदाहरण के लिये:
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) खुदरा मुद्रास्फीति को मापने और बेंचमार्क ब्याज दरों (रेपो रेट) को तय करने के लिये पूरी तरह से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर निर्भर करती है।
- सार्वजनिक क्षेत्र के प्रशासनिक समायोजन, जैसे कि वर्तमान और पूर्व सरकारी कर्मचारियों के लिये महँगाई भत्ता (DA) तथा महँगाई राहत, कानूनी रूप से इन्हीं मुद्रास्फीति सूचकांकों से जुड़े हुए हैं।
भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस में कार्यप्रणाली से जुड़े मुख्य सुधार क्या हैं?
सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
- आधार वर्ष में बदलाव: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने राष्ट्रीय लेखा (national accounts) के आधार वर्ष को आगे बढ़ाकर 2022-23 कर दिया है, जिससे GDP और GVA तुरंत आधुनिक उत्पादन परिदृश्य के अनुरूप हो गए हैं।
- डबल डिफ्लेटर विधि की शुरुआत: भारत ने कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों में वास्तविक GDP विकास दर का अनुमान लगाने के लिये ‘डबल डिफ्लेटर’ विधि को शामिल किया है।
- यह कार्यप्रणाली इनपुट और आउटपुट की कीमतों को अलग-अलग डिफ्लेट करती है, जिससे कीमतों में होने वाले बदलावों का वास्तविक प्रभाव सिंगल-डिफ्लेशन तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक सटीकता से दर्ज हो पाता है।
- क्षेत्रवार आनुपातिक आवंटन: अतीत की उन गलतियों को सुधारने के लिये जहाँ एक बहु-गतिविधि उद्यम के कुल उत्पादन को पूरी तरह से उसके किसी एक प्राथमिक क्षेत्र में आवंटित कर दिया जाता था, नई शृंखला गतिविधियों को अलग करती है और उन्हें उनके संबंधित क्षेत्रों में आनुपातिक रूप से वितरित करती है, जिससे क्षेत्रीय GDP योगदान की एक विश्वसनीय तस्वीर मिलती है।
- नए प्रशासनिक डेटा का एकीकरण: अपडेटेड राष्ट्रीय खातों में सांख्यिकीय विसंगतियों (statistical discrepancies) को बड़े पैमाने पर कम करने के लिये, नए व्यापक डेटाबेस को व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया गया है, जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST) डेटासेट और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) को विशेष रूप से शामिल किया गया है।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP)
- औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की अद्यतन समयरेखा: MoSPI ने आधार वर्ष को वर्ष 2022-23 में उन्नत करके औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) का आधुनिकीकरण किया है।
- आधुनिक उपयोगिताओं का समावेश: सूचकांक के दायरे को प्रमुख संरचनात्मक उपयोगी क्षेत्रों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया गया: गैस आपूर्ति, जल आपूर्ति, सीवरेज और अपशिष्ट प्रबंधन गतिविधियाँ।
- ऊर्जा एवं खनिजों का सूक्ष्म वर्गीकरण: IIP का पुनर्गठन करते हुए इसमें नवीकरणीय एवं गैर-नवीकरणीय विद्युत स्रोतों के मध्य स्पष्ट विभेद किया गया है, साथ ही विशिष्ट खनिजों के स्थानीयकृत वर्गीकरण का भी प्रावधान किया गया है।
- विस्तारित उत्पाद समूह: संशोधित औद्योगिक शृंखला में उत्पादों की संख्या बढ़ाकर 1,042 उत्पादों को 463 मद समूहों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है, जबकि पूर्ववर्ती व्यवस्था में 839 उत्पाद तथा 407 मद समूह सम्मिलित थे।
मुद्रास्फीति संकेतक
- CPI समूह का पुनर्गठन (खुदरा मुद्रास्फीति): MoSPI ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का आधार वर्ष 2024 कर दिया है तथा मदों के भार को घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES), 2023-24 के व्यापक आँकड़ों पर समायोजित किया है।
- निगरानी की जाने वाली मदों की संख्या 299 से बढ़ाकर 358 कर दी गई है, जिन्हें पूर्व की छह श्रेणियों के स्थान पर 12 विस्तृत विश्लेषणात्मक श्रेणियों में तार्किक रूप से वर्गीकृत किया गया है।
- उपभोक्ता समूह का पुनर्निर्धारण: अद्यतन खुदरा सूचकांक में पहली बार ग्रामीण आवास किराया, ऑनलाइन मीडिया स्ट्रीमिंग सेवाएँ, CNG तथा PNG को सम्मिलित किया गया है, जबकि टेप रिकॉर्डर और रेडियो जैसे अप्रचलित इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को पूर्णतः हटा दिया गया है।
- लिंकिंग फैक्टर: पुरानी एवं नई CPI शृंखलाओं के मध्य निरंतरता सुनिश्चित करने के लिये सरकार वर्ष 2025 के आँकड़ों के आधार पर, जो दोनों पद्धतियों के अंतर्गत संकलित किये गए हैं, एक लिंकिंग फैक्टर का उपयोग कर रही है। इससे एक पश्च-शृंखला का निर्माण संभव होगा, जिससे परंपरागत उपभोग समूह का पुनर्निर्माण किये बिना दीर्घकालिक मुद्रास्फीति प्रवृत्तियों का निर्बाध विश्लेषण किया जा सकेगा।
- WPI समूह का पुनर्निर्धारण (थोक मुद्रास्फीति): वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रबंधित थोक मूल्य सूचकांक (WPI) का आधार वर्ष 2022-23 कर दिया गया है तथा इसमें सम्मिलित मदों की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है।
- इसके अतिरिक्त, वर्गीकरण संबंधी विसंगतियों का निवारण करते हुए कच्चे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस को प्राथमिक मदों से हटाकर ‘ईंधन एवं शक्ति’ जैसे प्रमुख समूह में स्थानांतरित किया गया है।
- उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की शुरुआत: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की शुरुआत की है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में प्रयुक्त मानक है तथा उत्पादकों द्वारा आगतों के लिये भुगतान की जाने वाली कीमतों और निर्गतों से प्राप्त मूल्यों का पृथक अनुश्रवण करता है।
- परिवहन लागत एवं अप्रत्यक्ष करों जैसे अस्थिर मार्जिनों को बाहर रखते हुए तथा मदों एवं सेवाओं दोनों का व्यापक अनुश्रवण करने के कारण, आगामी पाँच वर्षों में PPI को चरणबद्ध रूप से WPI के स्थान पर पूर्णतः प्रतिस्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
भारत के सांख्यिकीय डेटाबेस को प्रभावित करने वाली स्थायी चुनौतियाँ क्या हैं?
- पुराने प्रतिदर्श ढाँचे: दशकीय जनगणना (जो वर्ष 2021 में निर्धारित थी) अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक विलंब का सामना कर रही है।
- जनगणना किसी राष्ट्र की सांख्यिकीय संरचना का आधारस्तंभ होती है, क्योंकि यह जनसांख्यिकीय गुणकों को उपलब्ध कराती है, जिनका उपयोग लगभग सभी प्रति व्यक्ति संकेतकों, गरीबी आकलनों तथा कल्याणकारी आवंटनों की गणना में किया जाता है।
- अद्यतन राष्ट्रीय जनगणना के अभाव में, भारत में नीति-निर्माता, शोधकर्त्ता तथा योजनाकार नियमित बड़े पैमाने के प्रतिदर्श सर्वेक्षणों तथा जनसांख्यिकीय प्रक्षेपणों के संयोजन पर निर्भर हैं। ये डेटासेट सामाजिक-आर्थिक तथा जनसंख्या संबंधी परिवर्तनों का आकलन करने के लिये प्राथमिक विकल्प के रूप में कार्य करते हैं।
- आधुनिक जनगणना के अभाव में, इन सर्वेक्षणों को वर्ष 2011 की जनसंख्या संरचना के आधार पर आँकड़ों का प्रक्षेपण करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप शहरी प्रवासन तथा ग्रामीण वास्तविकताओं से संबंधित अनुमानों में त्रुटियों की संचयी संभावना बढ़ जाती है।
- असंगठित क्षेत्र से संबंधित आँकड़ों का अभाव: भारत के लगभग 80% कार्यबल को नियोजित करने के बावजूद, असंगठित क्षेत्र (गैर-निगमित उद्यम, गिग कर्मी तथा दिहाड़ी श्रमिक) का सटीक अनुश्रवण करना अत्यंत कठिन है।
- नई GDP गणना पद्धति मुख्यतः वस्तु एवं सेवा कर (GST) नेटवर्क तथा कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) के अभिलेखों जैसे औपचारिक प्रशासनिक डेटाबेस पर निर्भर करती है।
- परिणामस्वरूप, असंगठित क्षेत्र के उत्पादन का अनुमान प्रायः औपचारिक क्षेत्र की वृद्धि को परोक्षी मानकर लगाया जाता है।
- यदि औपचारिक क्षेत्र का विस्तार संघर्षरत असंगठित क्षेत्र की कीमत पर होता है, तो राष्ट्रीय GDP कृत्रिम रूप से अधिक प्रतीत हो सकती है, जिससे मूलभूत स्तर पर विद्यमान आर्थिक संकट एवं सामाजिक कठिनाइयाँ आच्छादित हो जाती हैं।
- संस्थागत स्वायत्तता एवं विश्वसनीयता से संबंधित चुनौतियाँ: किसी सांख्यिकीय डेटाबेस का महत्त्व उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता की धारणा पर भी निर्भर करता है।
- आलोचकों का मत है कि आँकड़ों के नियंत्रण में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वर्ष 2019 में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) तथा राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के विलय से राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) का गठन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) की पर्यवेक्षण संबंधी शक्तियाँ संरचनात्मक रूप से कमज़ोर हुईं।
- हाल के विधायी प्रयासों, जैसे भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2025 के प्रारूप, ने व्यापक शैक्षणिक विरोध को जन्म दिया है।
- संस्थान की आंतरिक रूप से निर्वाचित परिषद के स्थान पर सरकार द्वारा नामित गवर्नर्स बोर्ड की स्थापना के प्रस्ताव ने शैक्षणिक स्वायत्तता के क्षरण तथा प्रमुख सांख्यिकीय संस्थानों में संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं।
- रोज़गार एवं गरीबी संबंधी आँकड़ों का अभाव: भारत में उच्च आवृत्ति वाले तथा सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य रोज़गार आँकड़ों का गंभीर अभाव है।
- जहाँ सरकार सुदृढ़ रोज़गार सृजन के दावों के समर्थन में आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) तथा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के पेरोल आँकड़ों पर निर्भर करती है, वहीं सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकाॅनमी (CMIE) जैसे निजी डेटाबेस प्रायः इसके विपरीत, अपेक्षाकृत उच्च बेरोज़गारी दरों की सूचना देते हैं।
- भारत ने तेंदुलकर समिति की पद्धति (जो वर्ष 2011-12 के आँकड़ों पर आधारित है) के पश्चात आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गरीबी रेखा को न तो परिभाषित किया है और न ही अद्यतन किया है। इसके परिणामस्वरूप आधुनिक कल्याणकारी योजनाओं तथा महामारी के पश्चात आर्थिक पुनरुद्धार के प्रभावों का सटीक आकलन करने में एक गंभीर डेटा-अंतराल उत्पन्न हो गया है।
- सूक्ष्म एवं विकेंद्रीकृत आँकड़ों का अभाव: राष्ट्रीय स्तर के समग्र आँकड़े प्रायः क्षेत्रों के मध्य विद्यमान गहन विषमताओं को प्रदर्शित नहीं करते हैं। यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर CPI अथवा GDP के आँकड़े उपलब्ध हैं, किंतु ज़िला अथवा विकास खंड स्तर के समष्टिगत आर्थिक आँकड़ों का गंभीर अभाव विद्यमान है।
- प्रभावी विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था, विशेषकर पंचायती राज, के लिये अत्यधिक स्थानीयकृत आँकड़ों की आवश्यकता होती है। जाति, लिंग तथा ज़िले के आधार पर पृथक किये गए सूक्ष्म आँकड़ों के अभाव में राज्य के हस्तक्षेप लक्षित समाधानों के बजाय सामान्य एवं कम प्रभावी उपायों तक सीमित रह जाते हैं।
भारत के सांख्यिकीय ढाँचे को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- समयबद्ध जनगणना का क्रियान्वयन: जनगणना 2027 भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें मोबाइल अनुप्रयोग-आधारित डेटा-संग्रहण तथा वैकल्पिक स्व-गणना की व्यवस्था की जाएगी।
- हालाँकि भारत की तकनीकी चुनौतियों और निरंतर डिजिटल विभाजन को देखते हुए, जनगणना के आँकड़ों की सटीकता, समावेशिता, विश्वसनीयता तथा नीति निर्माण के लिये उपयोगिता सुनिश्चित करने हेतु घर-घर जाकर सर्वेक्षण, ऑफलाइन डेटा संग्रह, जनगणना कर्मियों का सशक्त प्रशिक्षण, सत्यापन जाँच, डेटा सुरक्षा एवं पारदर्शी गुणवत्ता आश्वासन जैसे मज़बूत सुरक्षा उपाय आवश्यक होंगे।
- जाति-आधारित गणना के समावेशन से कल्याणकारी अर्थशास्त्र की प्रकृति में मूलभूत परिवर्तन होगा। इससे SECC, 2011 के पुराने आँकड़ों का स्थान लेने हेतु अधिक सटीक जानकारी उपलब्ध होगी तथा लक्षित एवं न्यायसंगत सकारात्मक भेदभाव नीतियों के निर्माण में सहायता मिलेगी।
- विधिक स्वायत्तता: वर्तमान में NSC कार्यपालिका के एक संकल्प के माध्यम से कार्य करता है। इसे भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के समान वैधानिक एवं संवैधानिक स्तर की स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिये।
- इससे NSC को विभिन्न मंत्रालयों द्वारा संकलित आँकड़ों का स्वतंत्र रूप से लेखापरीक्षण करने, आँकड़ों के प्रकाशन हेतु अनिवार्य समय-सारिणी निर्धारित करने तथा संघीय सांख्यिकी को राजनीतिक चक्रों अथवा नौकरशाही दमन से मुक्त रखने की शक्ति प्राप्त होगी।
- राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) को वैधानिक आधार एवं स्वायत्त नोडल प्राधिकरण का दर्जा प्रदान करना, सी. रंगराजन आयोग (2000) तथा वित्त संबंधी स्थायी समिति (2025) की अनुशंसाओं के अनुरूप है।
- ज़िला घरेलू उत्पाद (DDP): MoSPI को सभी राज्यों में ज़िला घरेलू उत्पाद (DDP) के संकलन को मानकीकृत तथा अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिये।
- नीति आयोग की 11वीं शासी परिषद बैठक में ज़िला घरेलू उत्पाद (DDP) के अनुमानों के विकास के संबंध में की गई अपील के अनुरूप, DDP को आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अंतर्गत विकास खंड-स्तरीय प्रतिदर्शीकरण के साथ एकीकृत किया जा सकता है। इससे पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) तथा ज़िला प्रशासन को सूक्ष्म एवं वास्तविक समय के आँकड़े उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे साक्ष्य-आधारित नियोजन, संसाधनों के दक्ष आवंटन तथा ज़मीनी स्तर पर विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकेगा।
- राज्य की प्रणालियों का क्षमता निर्माण: राज्यों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित विश्लेषण, संगणक-सहायित वैयक्तिक साक्षात्कार (CAPI) टैबलेट तथा वास्तविक समय सत्यापन सॉफ्टवेयर (जैसे e-SIGMA प्लेटफॉर्म) अपनाने में सहायता प्रदान करने हेतु केंद्र सरकार की सांख्यिकीय सुदृढ़ीकरण सहायता (SSS) योजना का व्यापक स्तर पर विस्तार किया जाना चाहिये।
- शैक्षणिक स्वायत्तता की रक्षा: भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) जैसे संस्थानों को अपने आंतरिक रूप से निर्वाचित, शिक्षाविदों के नेतृत्व वाले शासन मॉडल को बनाए रखना चाहिये।
- उच्च-स्तरीय डेटा अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिये प्रमुख सांख्यिकीय संस्थानों को नौकरशाही हस्तक्षेप से संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है।
- ओपन डेटा आर्किटेक्चर: हालाँकि ई-सांख्यिकी और माइक्रोडाटा पोर्टल जैसे पोर्टल सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन भारत को एक पूर्णतः ओपन-डेटा आर्किटेक्चर को अनिवार्य करना होगा, जहाँ सभी सरकारी सर्वेक्षणों से प्राप्त अनामित यूनिट-स्तरीय सूक्ष्म-डेटा को अकादमिक शोधकर्त्ताओं, अर्थशास्त्रियों तथा सामान्य जन के लिये बिना किसी नौकरशाही या शुल्क बाधा के निशुल्क उपलब्ध कराया जा सके।



