
प्रधानमंत्री द्वारा रासायनिक उर्वरकों को कम करने के लिये किये गए आग्रह के लिये उर्वरकों की अत्यधिक खपत को कम करने और सटीक पोषक तत्त्व प्रबंधन को प्रोत्साहित करने, कृषि उत्पादकता को राष्ट्रीय आर्थिक परिवर्तन के साथ संतुलित करने हेतु एक व्यवस्थागत पुनर्गठन की आवश्यकता है।
सारांश
- आयातित रासायनिक उर्वरकों पर भारत की निर्भरता भू-राजनीतिक तनावों के कारण महत्त्वपूर्ण राजकोषीय तनाव और आपूर्ति शृंखला जोखिम उत्पन्न करती है।
- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये, सरकार गंभीर NPK असंतुलन को ठीक करने हेतु नैनो-उर्वरकों, प्राकृतिक कृषि और सटीक मृदा परीक्षण को बढ़ावा दे रही है।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसे संरचनात्मक सुधार अब सतत, उच्च-दक्षता वाली कृषि को बढ़ावा देने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
भारत में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से संबंधित क्या चिंताएँ हैं?
- आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता: भारत में रॉक फॉस्फेट, पोटाश और मौलिक सल्फर के प्राकृतिक भंडारों की पुरानी कमी है, जिससे आयात पर भारी निर्भरता बनी हुई है।
- यद्यपि भारत के मोरक्को, सऊदी अरब और कतर के साथ आपूर्ति समझौते हैं, लेकिन आयात पर इसकी अत्यधिक निर्भरता इसे पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों के प्रति संवेदनशील बनाती है, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से, जो वैश्विक उर्वरक व्यापार के लगभग 30% को सँभालने वाला एक महत्त्वपूर्ण पारगमन मार्ग है, जिससे फॉस्फोरिक एसिड और पोटाश की आपूर्ति को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
- राजकोषीय तनाव: खरीफ 2026 सीज़न के लिये, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फॉस्फेटिक और पोटाश (P&K) उर्वरकों के लिये ₹41,534 करोड़ की भारी सब्सिडी को स्वीकृति प्रदान की – जो पिछले वर्ष की तुलना में ₹4,300 करोड़ से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।
- यह राष्ट्रीय खज़ाने पर महत्त्वपूर्ण दबाव डालता है और दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे के निवेश से महत्त्वपूर्ण पूंजी को तत्काल उपभोग सहायता में डाइवर्ट करके राजकोषीय घाटे को बढ़ाता है।
- सब्सिडी असंतुलन: एक प्रमुख नीतिगत चिंता यह है कि यूरिया अभी भी पोषक तत्त्व-आधारित सब्सिडी (NBS) ढाँचे के अंतर्गत नहीं है। यह यूरिया को NPK या DAP की तुलना में काफी सस्ता बनाता है, जिससे किसान नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग करने के लिये प्रोत्साहित होते हैं। कुछ क्षेत्रों में NPK अनुपात आदर्श 4:2:1 से बहुत दूर, 34:10:1 के चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है।
- यूरिया की नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) उल्लेखनीय रूप से कम है, जिसमें नाइट्रोजन का केवल एक तिहाई हिस्सा ही पौधों द्वारा अवशोषित किया जाता है; शेष हिस्सा अमोनिया वाष्पीकरण या भूजल में नाइट्रेट लीचिंग के माध्यम से नष्ट हो जाता है।
- मृदा स्वास्थ्य और उपज संतृप्ति: बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में, उर्वरकों की खपत बढ़ाने से अब फसल की उपज में आनुपातिक वृद्धि नहीं होती है क्योंकि मृदा का जैविक कार्बन समाप्त हो चुका है।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आँकड़े तेज़ी से ज़िंक, बोरॉन और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की व्यापक कमी को दर्शाते हैं, जिनकी पूर्ति अकेले रासायनिक उर्वरक नहीं करते हैं।
- परिवर्तन की चुनौती: ICAR के कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जब पारंपरिक यूरिया को 50% से अधिक प्रतिस्थापित किया जाता है, तो कम उपजाऊ मृदा में नैनो यूरिया और नैनो DAP का प्रदर्शन असंगत रहता है।
- नैनो-उर्वरकों के प्रभावी उपयोग के लिये फोलियर स्प्रे तकनीक (जैसे- ड्रोन) की आवश्यकता होती है, जिसे कई छोटे किसानों के लिये प्राप्त करना या वहन करना अभी भी कठिन है।
रासायनिक उर्वरक
- परिचय: रासायनिक उर्वरक (सिंथेटिक या अकार्बनिक उर्वरक) ऐसे निर्मित पदार्थ होते हैं जिनमें आवश्यक पादप पोषक तत्त्वों की उच्च सांद्रता होती है। जैविक उर्वरकों (जैसे- खाद या कम्पोस्ट) के विपरीत, जो जैविक पदार्थों से प्राप्त होते हैं, रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।
- तीन बड़े पोषक तत्त्व (NPK): रासायनिक उर्वरकों को तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (वृहत पोषक तत्त्व) प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया है जिनकी पौधों को बड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है:
- नाइट्रोजन (N): यह पत्तियों की वृद्धि और पौधे के “हरे” भागों के लिये आवश्यक है। इसका सबसे सामान्य रूप यूरिया है।
- फॉस्फोरस (P): यह जड़ों के विकास, फूलों के खिलने और बीजों के निर्माण के लिये महत्त्वपूर्ण है। इसके सामान्य रूपों में DAP (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) शामिल है।
- पोटेशियम (K): यह पौधे के समग्र स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता और जल विनियमन में मदद करता है। इसे आमतौर पर MOP (म्युरिएट ऑफ पोटाश) के रूप में उपयोग किया जाता है।
- औद्योगिक उत्पादन विधि: हैबर-बॉश प्रक्रिया सबसे प्रसिद्ध विधि है, जिसका उपयोग हवा से नाइट्रोजन लेकर और उच्च दबाव में इसे हाइड्रोजन (आमतौर पर प्राकृतिक गैस से प्राप्त) के साथ मिलाकर नाइट्रोजन उर्वरक निर्माण के लिये किया जाता है।
- जैविक उर्वरकों में अंतर:
| विशेषता | रासायनिक उर्वरक | जैविक खाद |
| उत्पत्ति | कृत्रिम/मानव निर्मित | पौधे या पशु अपशिष्ट |
| उत्सर्जित होने की गति | तत्काल | धीमी प्रक्रिया (इसे विघटित करने के लिये मृदा सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता होती है) |
| थोक/बल्क | छोटा और परिवहन में आसान | भारी और सँभालने में कठिन |
- औद्योगिक नवाचार: नैनो-उर्वरकों (नैनो यूरिया और नैनो DAP) और नीम-लेपित यूरिया को बढ़ावा देना एक व्यापक आर्थिक बदलाव है जिसका उद्देश्य “पोषक तत्त्व उपयोग दक्षता” (NUE) को बढ़ाना है।
- पारंपरिक थोक उर्वरकों की भौतिक मात्रा को कम करके, भारत अपनी रसद लागतों को कम कर रहा है, गोदाम की आवश्यकताओं को घटा रहा है और आयातों के लिये उपयोग होने वाले विशाल विदेशी मुद्रा बहिर्वाह में कटौती कर रहा है।
भारत की कृषि उत्पादकता और व्यापक आर्थिक स्वास्थ्य हेतु उर्वरकों का क्या महत्त्व है?
- कृषि उत्पादकता पर प्रभाव: उर्वरक भारत की उच्च उपज देने वाली किस्मों के लिये “ईंधन” के समान हैं। रासायनिक उर्वरक नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाशियम (K) की सघन मात्रा उपलब्ध कराते हैं, जिन्हें प्राकृतिक खाद बड़े पैमाने पर उपलब्ध नहीं करा सकती।
- सीमित कृषि योग्य भूमि की स्थिति में, उर्वरक प्रत्येक फसल कटाई के बाद मिट्टी के पोषक तत्त्वों की शीघ्र पूर्ति करके वर्ष में अनेक फसल चक्रों—रबी, खरीफ और जायद—को संभव बनाते हैं।
- खाद्यान्नों के अलावा, उर्वरक तिलहन, दलहन और चारे के उत्पादन के लिये भी अत्यंत आवश्यक हैं, जो भारत के विशाल दुग्ध क्षेत्र—विश्व के सबसे बड़े डेयरी क्षेत्र—को समर्थन प्रदान करते हैं।
- खाद्य सुरक्षा: 1.4 अरब से अधिक जनसंख्या वाले भारत में चावल और गेहूँ जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों के अधिशेष उत्पादन को बनाए रखने हेतु उर्वरक अनिवार्य हैं, क्योंकि ये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- गरीबी उन्मूलन: अधिक उत्पादन से ग्रामीण आय में वृद्धि होती है। चूँकि भारत की बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है, इसलिये उर्वरकों की उपलब्धता का सीधा प्रभाव ग्रामीण उपभोग और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि पर पड़ता है।
- कृषि भारत के लगभग 42% कार्यबल को रोज़गार प्रदान करती है और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 17–18% योगदान देती है।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण: कृषि उत्पादकता खाद्य मुद्रास्फीति के विरुद्ध प्रमुख सुरक्षा कवच है, जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है। गेहूँ और चावल जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों में आपूर्ति झटकों को रोककर सरकार एक स्थिर मौद्रिक नीति बनाए रख सकती है तथा “खाद्य मूल्य-प्रेरित” आर्थिक अस्थिरता से बच सकती है।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- पीएम-प्रणाम योजना
- नैनो-उर्वरक (नैनो यूरिया और नैनो DAP)
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)
- गोबरधन योजना
- नीम कोटेड यूरिया (NCU)
- पोषक तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS)
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने हेतु कौन-से कदम उठाने की आवश्यकता है?
- “टेपरींग” रणनीति का कार्यान्वयन: विशेषज्ञ अचानक बंद करने के बजाय उर्वरकों के उपयोग में क्रमिक कमी की सिफारिश करते हैं। संक्रमणकालीन कृषि व्यवस्था के लिये 40% जैविक स्रोत, 30% जैव-उर्वरक और 30% रासायनिक यूरिया का अनुपात एक सतत मानक माना जाता है।
- सटीक मृदा परीक्षण: किसानों को स्थान-विशिष्ट पोषक तत्त्व प्रबंधन के लिये कैडस्ट्रल मानचित्रों का उपयोग करना चाहिये, ताकि उस मृदा पर उर्वरक व्यर्थ न जाए जिसमें किसी विशेष पोषक तत्त्व की मात्रा पहले से पर्याप्त हो। साथ ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से ज़िंक, बोरॉन और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान की जानी चाहिये, बजाय इसके कि केवल अधिक यूरिया या DAP का उपयोग किया जाए।
- पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाना: मृदा की पोषक तत्त्व उत्पन्न करने की प्राकृतिक क्षमता को पुनर्स्थापित करने से बाहरी रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
- हरित खाद: ढैंचा या सनई जैसी दलहनी फसलों को उगाकर मुख्य बुवाई से पहले उन्हें मिट्टी में मिला दिया जाता है, जिससे प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण (nitrogen fixation) होता है।
- फसल चक्र: प्रत्येक फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करने से कीट चक्र टूटता है और मिट्टी की उर्वरता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है।
- कार्बन संवर्द्धन: मिट्टी में जैविक पदार्थ (कम्पोस्ट/बायोचार) मिलाकर उसकी कार्बन क्षमता बढ़ाई जाती है, जो पोषक तत्त्वों को धारण करने वाले “स्पंज” की तरह कार्य करती है।
- नीतिगत एवं संरचनात्मक सुधार: सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन की दिशा रासायनिक उर्वरकों की खरीद से हटाकर उनकी बचत और दक्ष उपयोग को बढ़ावा देने की ओर स्थानांतरित करनी चाहिये।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): कृत्रिम रूप से कम कीमतों के कारण होने वाले “अंधाधुंध उपयोग” को हतोत्साहित करने के लिये उद्योग-व्यापी सब्सिडी के बजाय सीधे किसानों को सहायता प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये।
- आपूर्ति शृंखला निगरानी: एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (iFMS) के माध्यम से उर्वरक को संयंत्र से अंतिम उपभोक्ता तक ट्रैक करने से सब्सिडी वाले यूरिया के गैर-कृषि उद्योगों की ओर होने वाले दुरुपयोग और विचलन को रोका जा सकता है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा (GOBARdhan): पशु अपशिष्ट को बायो-सीएनजी (Bio-CNG) और बायो-स्लरी में परिवर्तित करने से किसानों को उच्च गुणवत्ता वाला जैविक पोषक स्रोत उपलब्ध कराया जा सकता है।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी का एकीकरण: ड्रोन के माध्यम से पत्तियों पर छिड़काव करने से—जैसा कि नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत प्रोत्साहित किया जा रहा है—पोषक तत्त्व सीधे पौधों की पत्तियों तक पहुँचते हैं, जिससे मिट्टी में जाने वाले रसायनों की मात्रा न्यूनतम हो जाती है।
- उर्वरकों के प्रयोग को ड्रिप सिंचाई (फर्टिगेशन) के साथ एकीकृत करने से पोषक तत्त्व तरल रूप में सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुँचते हैं, जिससे पारंपरिक प्रसारण विधियों की तुलना में अपव्यय में उल्लेखनीय कमी आती है।
निष्कर्ष
भारत के उर्वरक परिवर्तन में तत्काल खाद्य सुरक्षा और दीर्घकालिक पारिस्थितिक एवं राजकोषीय स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अंधाधुंध यूरिया उपयोग से हटकर सटीक कृषि और जैव-आधारित विकल्पों की ओर बढ़कर देश आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियों एवं मृदा क्षरण को कम कर सकता है। सतत कृषि उत्पादकता और व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये एक क्रमिक, नीति-समर्थित “टेपरींग” (धीरे-धीरे कमी लाने की) रणनीति आवश्यक है।
