
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 2025 के सर्वेक्षण में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ते उपयोग, जेब से होने वाले व्यय (Out-of-Pocket Expenditure) में कमी तथा सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच को रेखांकित किये जाने के बाद, भारत की सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की दिशा में प्रगति चर्चा में है। यह प्रगति आयुष्मान भारत तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी पहलों से प्रेरित रही है।
सारांश
- भारत ने आयुष्मान भारत, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों, डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफार्मों, विस्तारित चिकित्सा बुनियादी ढाँचे और लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों (हस्तक्षेपों) के माध्यम से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, सामर्थ्य (किफायती दरों) तथा स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हुआ है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कम व्यय (खर्च), गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते मामले, क्षेत्रीय असमानताएँ, गवर्नेंस (प्रशासनिक) कमियाँ और लगातार बढ़ रहा जेब से होने वाला खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर), सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अधिक निवेश, मज़बूत विनियमन (रेगुलेशन), डिजिटल एकीकरण तथा एक सुदृढ़ ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ (राइट टू हेल्थ) ढाँचे की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
भारत के हेल्थकेयर क्षेत्र में क्या उपलब्धियाँ हैं?
यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज और बीमा
- AB-PMJAY (आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना): राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत वर्ष 2018 में शुरू की गई ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (AB-PMJAY), सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित 12 करोड़ परिवारों को प्रतिवर्ष प्रति परिवार ₹5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है।
- व्याप्ति और पहुँच: इस योजना के तहत 44.14 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किये जा चुके हैं, जिसके अंतर्गत 12.03 करोड़ मरीज़ों के अस्पताल में भर्ती होने का खर्च सरकार द्वारा वहन किया गया है। 19 भाषाओं में उपलब्ध आयुष्मान ऐप, लाभार्थियों के लिये इस सेवा का लाभ उठाना और भी सुगम बनाता है।
- वरिष्ठ नागरिक कवरेज: अक्तूबर 2024 में शुरू की गई ‘आयुष्मान भारत वय वंदना’ योजना के तहत 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिकों को इस स्वास्थ्य सुरक्षा (बीमा) के दायरे में शामिल किया गया है।
- जून 2026 तक, 1.20 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को इस योजना में नामांकित किया गया, जिन्होंने ₹3,000 करोड़ मूल्य के मुफ्त इलाज का लाभ उठाया।
- केस स्टडी: बिहार की रहने वाली सोनी खातून का परिवार कर्ज के बोझ में पूरी तरह डूब रहा था, लेकिन AB-PMJAY के तहत लखनऊ में उनकी हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट (दिल का वाल्व बदलने) की सर्जरी पूरी तरह से निशुल्क की गई।
प्राथमिक चिकित्सा का लोकतंत्रीकरण
- आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAMs): 1.86 लाख से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों (जिनमें उप-केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी PHCs और आयुष केंद्र शामिल हैं) को अपग्रेड (उन्नत) किया गया है, ताकि 12 तरह की मुफ्त व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जा सकें।
- इन केंद्रों पर कुल मिलाकर 540 करोड़ से अधिक की रिकॉर्ड संचयी उपस्थिति दर्ज की गई है।
- केस स्टडी: असम का लालमाटी उप-केंद्र एक आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM) में बदल गया, जिसने गैर-संचारी रोगों (NCDs) की जाँच (स्क्रीनिंग) और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की शुरुआत की है।
- सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों) के नेतृत्व में, इस क्षेत्र ने वर्ष 2024 से रोके जा सकने वाले कारणों से होने वाली मातृ और शिशु मृत्यु दर को शून्य (ज़ीरो) करने की उपलब्धि हासिल की है।
महामारी की तैयारी और बुनियादी ढाँचा
- PM-ABHIM: प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM) अनुकूलन स्वास्थ्य अवसंरचना का निर्माण कर रहा है, जिसके अंतर्गत 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी ज़िलों में 744 एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएँ तथा 631 क्रिटिकल केयर अस्पताल ब्लॉक स्थापित किये जा रहे हैं।
- कोविड-19 प्रतिक्रिया: भारत ने 220 करोड़ से अधिक खुराकों (डोज़) के साथ विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाया, ICU बेड की संख्या को 2,168 से बढ़ाकर 1.45 लाख किया और ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के तहत 100 देशों को लगभग 30 करोड़ (300 मिलियन) वैक्सीन खुराक की आपूर्ति की।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और रोग उन्मूलन
- सुरक्षित मातृत्व: ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ (PMSMA) (जिसके तहत 7.47 करोड़ गर्भवती महिलाओं की जाँच की जा चुकी है) और ‘जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ (JSSK) जैसी योजनाएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि प्रसव (डिलीवरी) के दौरान परिवारों की जेब से एक भी पैसा खर्च न हो।
- आशा कार्यकर्त्ताओं की सक्रिय निगरानी सुरक्षित संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करती है।
- टीकाकरण: ‘मिशन इंद्रधनुष’ के तहत पहले से प्रतिरक्षित (टीकाकरण से छूटे हुए) 5.46 करोड़ बच्चों का टीकाकरण किया गया।
- अप्रैल 2026 तक, “ज़ीरो-डोज़” वाले बच्चों की आबादी घटकर सिर्फ 0.06% रह गई है।
- टीबी (क्षय रोग) और मलेरिया के खिलाफ जंग: ‘प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान’ के तहत 20 करोड़ लोगों की जाँच की गई, जबकि 3.78 लाख ‘निक्षय मित्रों‘ ने 20 लाख मरीज़ों को पौष्टिक भोजन की टोकरी (फूड बास्केट) उपलब्ध कराई। इसके साथ ही वर्ष 2010 के बाद से मलेरिया से होने वाली मौतों में 78% की कमी आई है तथा माँ से बच्चे में HIV के संचरण (फैलने) की दर में 74.5% की गिरावट दर्ज की गई है।
गैर-संचारी रोगों (NCDs) का प्रबंधन
- व्यापक स्वास्थ्य परीक्षण: आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (AAMs) के माध्यम से देशव्यापी स्तर पर अभूतपूर्व संख्या में स्वास्थ्य परीक्षण किये गए हैं, जिसमें उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) के लिये 41.5 करोड़, मधुमेह (डायबिटीज़) के लिये 41.3 करोड़ तथा ओरल (मुँह), स्तन (Breast) व गर्भाशय ग्रीवा (Cervical) के कैंसर हेतु संयुक्त रूप से 60 करोड़ से अधिक की स्क्रीनिंग शामिल है।
- डायलिसिस एवं कैंसर चिकित्सा: ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम’ (PMNDP) के अंतर्गत देश में अब तक 4 करोड़ से अधिक निशुल्क ‘हेमोडायलिसिस सत्र’ आयोजित किये जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य क्षेत्र को मज़बूत करते हुए सभी 22 नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में कैंसर चिकित्सा सुविधाओं की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की गई है।
- जीवनशैलीगत सुधार एवं हस्तक्षेप: गैर-संचारी रोगों (NCDs) को उनके शुरुआती व मूल स्तर पर नियंत्रित करने के लिये ‘ईट राइट इंडिया‘ तथा ‘फिट इंडिया मूवमेंट‘ जैसे राष्ट्रव्यापी अभियानों के माध्यम से स्वास्थ्य के मूल कारणों (जैसे खान-पान और शारीरिक सक्रियता) पर काम किया जा रहा है।
- भारत ने तंबाकू के उपयोग में 17.3% की कमी लाने और एक सफल ‘राष्ट्रीय तंबाकू छोड़ने की हेल्पलाइन’ लागू करने के लिये वर्ष 2025 का ‘ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज़ अवॉर्ड’ भी जीता है।
डिजिटल हेल्थ और लास्ट-माइल डिलीवरी
- ABDM और U-WIN: अब तक 20.49 करोड़ से अधिक विशिष्ट (यूनिक) आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य खाते (ABHA) बनाए जा चुके हैं। वहीं ‘यू-विन’ (U-WIN) प्लेटफॉर्म डिजिटल रूप से 11.87 करोड़ बच्चों और 3.96 करोड़ गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण को ट्रैक (निगरानी) करता है।
- टेलीमेडिसिन और ड्रोन: ई-संजीवनी ने 47 करोड़ से अधिक टेली-कंसल्टेशन (दूर-दराज़ से चिकित्सा परामर्श) उपलब्ध कराए हैं।
- टेली-मानस (Tele-MANAS) 20 भाषाओं में 53 केंद्रों (सेल्स) के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा ICMR के ‘आई-ड्रोन’ (i-DRONE) ने दुर्गम क्षेत्रों के 7,700 किलोमीटर के दायरे में 22,000 दवाएँ पहुँचाई हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का अनुप्रयोग: स्वास्थ्य क्षेत्र में AI ‘क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम’ (CDSS), ‘कफ अगेंस्ट टीबी’ टूल (जो टीबी के 12-16% अतिरिक्त अज्ञात मामलों की पहचान करने में सक्षम है) तथा डायबिटिक रेटिनोपैथी (मधुमेह जनित दृष्टिदोष) की स्वचालित एवं त्वरित स्क्रीनिंग हेतु ‘मधुनेत्र एआई’ (MadhuNetrAI) जैसे नवाचारों के माध्यम से रोग निदान (डायग्नोस्टिक्स) की पूरी प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है।
वहनीय औषधियाँ, डायग्नोस्टिक्स एवं कार्यबल संवर्द्धन
- लागत में कमी: 18,000 से अधिक जन औषधि केंद्र (जहाँ 50-90% तक सस्ती जेनेरिक दवाएँ मिलती हैं) और 255 अमृत (AMRIT) फार्मेसियाँ (जिन्होंने मरीज़ों के 8,400 करोड़ रुपये बचाए हैं) किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित कर रहे हैं।
- ‘निशुल्क निदान पहल’ के तहत ज़िला अस्पतालों में 57 प्रकार तक की जाँचे (टेस्ट) निशुल्क की जाती हैं (यह मॉडल आंध्र प्रदेश की ‘NTR वैद्य परीक्षा’ की सफलता से प्रेरित है)।
- कार्यबल और आयुष: मेडिकल कॉलेजों की संख्या दोगुनी हो गई है और 157 नए नर्सिंग कॉलेज स्थापित किये जा रहे हैं।
- आयुष (AYUSH) मंत्रालय ने 13,093 चिकित्सा केंद्रों (फैसिलिटीज़) में पारंपरिक चिकित्सा को एकीकृत (शामिल) किया है और वैश्विक चिकित्सा पर्यटन (ग्लोबल मेडिकल टूरिज़्म ) के लिये जुलाई 2023 में एक समर्पित ‘आयुष वीज़ा’ की शुरुआत की है।
भारत की स्वास्थ्य सेवा में क्या चुनौतियाँ हैं?
- राजकोषीय घाटा: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 का वर्ष 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5% तक बढ़ाने का लक्ष्य अधूरा रह गया है, जिसने सरकारी चिकित्सा सुविधाओं के बुनियादी और संरचनात्मक विस्तार को गंभीर रूप से सीमित कर दिया है।
- कोविड-19 के पश्चात केंद्र सरकार के स्वास्थ्य व्यय में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जो वर्ष 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 0.37% से घटकर वर्ष 2025-26 में मात्र 0.29% रह गया है।
- महत्त्वपूर्ण ‘केंद्र प्रायोजित योजनाओं’ के अंतर्गत राज्यों को दिये जाने वाले स्वास्थ्य हस्तांतरण (ट्रांसफर) में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी वर्ष 2014-15 के 75.9% से उल्लेखनीय रूप से घटकर वर्ष 2024-25 में मात्र 43% रह गई है।
- यह कमी अग्रिम पंक्ति (फ्रंटलाइन) के स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे के रखरखाव और संचालन के लिये राज्य-स्तरीय वित्तीय क्षमता को कमज़ोर करती है।
- कम प्रति व्यक्ति सार्वजनिक निवेश: भारत का प्रति व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च वैश्विक स्तर पर सबसे कम (निचले स्तर) में से एक बना हुआ है।
- भारत भूटान (जो 2.5 गुना अधिक खर्च करता है) और श्रीलंका (जो 3 गुना अधिक खर्च करता है) की तुलना में स्वास्थ्य पर काफी कम खर्च करता है।
- अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में यह असमानता और अधिक स्पष्ट हो जाती है; समान BRICS देशों में प्रति व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भारत की तुलना में 14 से 15 गुना अधिक व्यय किया जाता है, जबकि थाईलैंड और मलेशिया जैसे ASEAN देश भारत से लगभग 10 गुना अधिक व्यय करते हैं।
- विभागीय रूप से पृथक संस्थागत कार्यप्रणाली: यद्यपि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (NHP 2017) एक समग्र ‘सभी नीतियों में स्वास्थ्य (Health in All Policies)’ ढाँचे का समर्थन करती है, तथापि स्वास्थ्य के प्रमुख निर्धारक जैसे- स्वच्छता, पोषण, स्वच्छ जल एवं वायु प्रदूषण विभिन्न मंत्रालयों द्वारा स्वायत्त बजटीय आवंटन एवं पृथक कार्य-प्रणालियों के अंतर्गत संचालित किये जाते हैं।
- यह संस्थागत विखंडन संसाधनों के समेकन को बाधित करता है, जिससे समग्र एवं संचयी परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को उन रोगों से निपटना पड़ता है जिन्हें प्रारंभिक स्तर पर रोका जा सकता था।
- ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता; अस्पताल एवं औषधालय’ वर्तमान में संविधान की राज्य सूची (सातवीं अनुसूची) की प्रविष्टि 6 के अंतर्गत आते हैं। यह संवैधानिक व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर समान एवं विधिक रूप से बाध्यकारी मानकों के प्रवर्तन को कठिन बनाती है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में क्षेत्रीय असमानताएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं।
- NITI आयोग के निष्कर्ष: प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) के अंतर्गत निजी अस्पतालों में उपचार प्राप्त करने वाले मरीज़ों पर अभी भी महत्त्वपूर्ण आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर (Out-of-Pocket Expenditure- OOPE) जारी है, जैसा कि NITI आयोग द्वारा कमीशन्ड मूल्यांकन अध्ययन में पाया गया।
- यद्यपि PMJAY को पूर्णतः कैशलेस योजना के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित किया गया है, तथापि अध्ययन में यह पाया गया कि 65% लाभार्थियों को अभी भी अपने खर्च से भुगतान करना पड़ा, जबकि केवल 35% को ही पूर्णतः कैशलेस अस्पतालीकरण का लाभ मिला। यह स्थिति नियामक निगरानी एवं पैनल में शामिल संस्थानों के अनुपालन में गंभीर कमियों को उजागर करती है।
- विधिक आधार का अभाव: भारत में एक केंद्रीकृत, विधिक रूप से प्रवर्तनीय ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ अधिनियम का अभाव है, जो नागरिकों के लिये पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, अवसंरचना तक पहुँच तथा राज्य की जवाबदेही को कानूनी रूप से बाध्यकारी बना सके।
- गैर-संचारी रोगों का विस्फोट: भारत में हृदय रोग, मधुमेह एवं कैंसर जैसे गैर-संचारी रोग अब कुल मृत्यु के लगभग 60% के लिये उत्तरदायी हैं। यह मुख्यतः निष्क्रिय जीवनशैली एवं तंबाकू सेवन से प्रेरित है, जिससे तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ता है तथा दीर्घकालिक एवं सतत चिकित्सा प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
- भौगोलिक एवं भौतिक बाधाएँ: दूरस्थ, पर्वतीय एवं अविकसित ग्रामीण क्षेत्रों तक उन्नत चिकित्सा सामग्री (जैसे टीके एवं रक्त नमूने) तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों की पहुँच एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती है, जिसके परिणामस्वरूप “शून्य डोज़” बच्चों की समस्या तथा मातृ मृत्यु दर में वृद्धि देखी जाती है।
- मानसिक स्वास्थ्य में कलंक एवं पहुँच: मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ ऐतिहासिक रूप से कलंकित एवं कम संसाधित रही हैं तथा मनोचिकित्सा सेवाएँ मुख्यतः बड़े शहरी केंद्रों तक सीमित हैं, जिससे ग्रामीण जनसंख्या सेवाओं से वंचित रह जाती है।
- पारंपरिक प्रणालियों में निदान अंतराल: केवल पारंपरिक स्क्रीनिंग विधियों पर निर्भरता के कारण प्राथमिक स्तर पर विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपस्थिति में तपेदिक (TB) एवं डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी जटिल बीमारियों का समय पर निदान अक्सर छूट जाता है।
स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करने के लिये क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- वित्तीय सुधार पथ को अनिवार्य बनाना: सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5% से 3% तक पहुँचाने के लिये एक विधिक रूप से समर्थित वित्तीय रोडमैप स्थापित किया जाना चाहिये।
- केंद्र सरकार को महामारी के बाद के व्यय में कमी को पलटते हुए अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर GDP के 1% के लक्ष्य को हासिल करने के लिये प्रयास करने चाहिये।
- एआई-संचालित निदान का विस्तार: ग्रामीण आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (AAM) में प्रारंभिक स्क्रीनिंग स्तर पर विशेषज्ञों की आवश्यकता को कम करने हेतु मधुनेत्रएआई और कफ अगेंस्ट टीबी जैसे एआई उपकरणों का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिये।
- ड्रोन लॉजिस्टिक्स का विस्तार: कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को सुचारु रूप से पार करते हुए रक्त नमूने, टीके एवं आवश्यक दवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये i-DRONE नेटवर्क का राष्ट्रव्यापी संस्थानीकरण किया जाना चाहिये।
- ‘जन आंदोलन’ (People’s Movement) दृष्टिकोण को बनाए रखना: टीबी पोषण हेतु ‘निक-क्षय मित्र’ तथा ‘ईट राइट इंडिया’ प्रमाणन जैसी समुदाय-आधारित पहलों की सफलता को दोहराते हुए गैर-संचारी रोगों (NCD) की वृद्धि को रोकने के लिये सामुदायिक व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- पारंपरिक एवं आधुनिक चिकित्सा का एकीकरण: आयुष ग्रिड के क्रियान्वयन में तेज़ी लाते हुए सभी पारंपरिक चिकित्सा अस्पतालों एवं प्रयोगशालाओं को डिजिटल रूप से जोड़ा जाना चाहिये, जिससे भारत को समग्र उपचार एवं चिकित्सा पर्यटन के लिये विश्व का प्रमुख केंद्र बनाया जा सके, साथ ही आयुष वीज़ा के माध्यम से इसे सुदृढ़ किया जा सके।
- डिजिटल पोर्टेबिलिटी को सुदृढ़ करना: सभी सार्वजनिक एवं निजी अस्पतालों में 14-अंकीय ABHA ID तथा U-WIN प्लेटफॉर्म का 100% उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिये, जिससे एक निर्बाध, पेपरलेस (कागज़ रहित) एवं सतत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली विकसित हो सके।
- स्वास्थ्य के अधिकार का विधिक ढाँचा: एक व्यापक ‘स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम’ पारित कर स्वास्थ्य सेवाओं को न्यायसंगत अधिकार के रूप में स्थापित किया जाना चाहिये, जिससे राज्य पर सुदृढ़ स्वास्थ्य अवसंरचना विकसित करने तथा अप्रत्यक्ष लागतों को समाप्त करने का विधिक दायित्व सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
भारत ने स्वास्थ्य अवसंरचना, डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों, निवारक देखभाल तथा आयुष्मान भारत के माध्यम से वित्तीय सुरक्षा में निरंतर निवेश कर सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। इन प्रयासों ने स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने तथा समग्र स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करने में योगदान दिया है। ये पहलें सतत विकास लक्ष्य 3 (SDG 3: अच्छा स्वास्थ्य एवं कल्याण) की प्राप्ति में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं तथा एक स्वस्थ एवं अधिक उत्पादक जनसंख्या के निर्माण के माध्यम से ‘विकसित भारत @ 2047’ के दृष्टिकोण को साकार करने में सहायक हैं।





