
तनाव का मूल है अज्ञान और भ्रम।
इसी अज्ञान से हमारी अंदर कामनाएँ जन्म लेती हैं।
जब कामनाओं की पूर्ति नहीं होती → असंतोष आता है।
जब पूरी हो जाती हैं → लोभ जागता है।
अगर कामना पूर्ति में बाधा आए → क्रोध।
क्रोध हमारी बुद्धि और स्मृति को मलिन कर देता है।
सुख की गलत धारणा
यही वह तनाव है जिसे लोग डिप्रेशन कहते हैं।
हम सोचते हैं, अगर हमें मनचाही चीज़ें मिल जाएँ तो सुखी हो जाएँगे।
लेकिन वास्तविकता कुछ और है…
धन और भोग का भ्रम
हमें धन प्रिय है?
नहीं।
प्रिय है वह भोग जो धन से मिलता है।
रुपया प्रिय नहीं, रुपया से मिलने वाली सामग्री प्रिय है।
हम जो चाहे उसे भोग सकें, जहाँ चाहे जा सकें — यही सुख है।
लेकिन सोचिए — जिनके पास यह सब है, क्या वे तृप्त हैं?
नहीं।
क्यों नहीं मिलती तृप्ति?
सोचिए — पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करूँ,
धन कमाऊँ, मकान बनाऊँ, सुंदर जीवन साथी पाऊँ,
भोग करूँ, मित्र बनाऊँ…
फिर भी तृप्ति नहीं मिलती।
इच्छा की अनंत श्रृंखला
विडंबना देखिए — जिस व्यक्ति या वस्तु को देखकर हम सोचते हैं कि अगर यह मिल जाए तो हम सुखी हो जाएँगे,
वही व्यक्ति या वस्तु किसी और के पास है। लेकिन वह व्यक्ति किसी तीसरे को पाने की सोच रहा है।
तीसरा व्यक्ति चौथे की तरफ देख रहा है।
इस सब में तृप्ति किसी को नहीं मिल रही।
इस सब का मूल कारण? अज्ञान।
समाधान: अध्यात्म का मार्ग
अज्ञान से बाहर निकलने का उपाय केवल अध्यात्म है।
अन्यथा मन दलदल में फंस जाता है।
कितना भी, कुछ भी, पा लो, कभी तृप्ति नहीं होती।
मन को सीमा में रखना
मन को सीमा में रखना सीखो।
धर्म हमें सीमा देता है:
खाना, पीना, भोग, संबंध — सब धर्मपूर्वक।
नाम जप करो, धर्म के अनुसार भोगो।
तभी मन को विश्राम मिलेगा।
असली नवीनता और तृप्ति
मन हमेशा नया, सुंदर, नवीन चाहता है।
धन, वस्त्र, मित्र, पत्नी — सब नवीन चाहिए।
लेकिन असली नवीन और तृप्ति केवल भगवान में है।
पहला कदम: शुद्ध जीवन
पहले गंदे दृश्य, गंदी बातें, गंदी क्रियाएँ छोड़ो।
फिर विचार शुद्ध होंगे।
हर परिस्थिति में आनंद रहेगा।
वर्तमान का आनंद
Overthinking छोड़ो।
आज जो सामने है, उसका स्वाद लो।
कल और परसों की चिंता मत करो।
इस संसार का सबसे बड़ा सुख मन और इंद्रियों के भोग में नहीं है।
सुख है—शुद्ध विचारों और भगवान में स्थित मन में।
तीन शर्तें मन की शांति के लिए
पहली शर्त:
गंदी बातें, दृश्य और क्रियाएँ छोड़ो।
दूसरी शर्त:
धर्म के अनुसार भोगो।
तीसरी शर्त:
नाम जप, सत्संग और सेवा अपनाओ।
जब ये शर्तें पूरी होंगी, मन तृप्त होगा।
तनाव, असंतोष और डिप्रेशन का अंत होगा।
निष्कर्ष
तनाव, चिंता और डिप्रेशन का एक ही उपाय है —
भगवान का नाम और अध्यात्म में स्थित होना।
बाकी सब माया का खेल है।
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज तनाव से निपटने पर मार्गदर्शन करते हुए
