
यह एडिटोरियल 12/06/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित “Right time to focus on sustainable agriculture” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। लेख में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और सतत कृषि ढाँचे की ओर अग्रसर होना चाहिये। इसमें जलवायु परिवर्तन के बीच खाद्य संवहनीयता सुनिश्चित करने के लिये समर्थन नीतियों को पुनर्व्यवस्थित करने, अनुसंधान एवं विकास निधि बढ़ाने और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को प्रोत्साहन देने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।
जलवायु परिवर्तन और संसाधन-प्रधान कृषि पद्धतियों से उत्पन्न बहुआयामी चुनौतियों से निपटने के लिये, भारत को सतत विकास एवं उत्पादकता को प्राथमिकता देने वाले एक समुत्थानशील कृषि ढाँचे की ओर तत्काल अग्रसर होना चाहिये। इसके लिये अनुसंधान एवं विकास (R&D) हेतु सार्वजनिक तथा निजी (CSR-सदृश) वित्तपोषण का विस्तार करना तथा ‘प्रयोगशाला-से-खेत तक’ प्रौद्योगिकी अंतरण को सुदृढ़ करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, वास्तविक काल में फसल परामर्श उपलब्ध कराने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मौसम पूर्वानुमान मॉडलों का एकीकरण भी अनिवार्य है।
सतत कृषि क्या है?
- परिचय: सतत कृषि एक ऐसी कृषि पद्धति है जो भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किये बिना समाज की वर्तमान खाद्य और वस्त्र संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करती है।
- औद्योगिक कृषि के विपरीत, जो प्रायः रासायनिक पदार्थों के गहन उपयोग के माध्यम से अल्पकालिक उत्पादन को प्राथमिकता देती है, सतत कृषि एक ऐसी बंद-चक्र प्रणाली के रूप में कार्य करती है जो प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की कार्यप्रणाली का अनुकरण करती है।
- सतत कृषि के स्तंभ: मूल रूप से, यह तीन मुख्य स्तंभों को संतुलित करता है: पर्यावरणीय स्वास्थ्य, आर्थिक लाभप्रदता और सामाजिक समानता।
- पर्यावरण स्वास्थ्य: यह मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और जैव विविधता के संरक्षण एवं सुधार पर केंद्रित है। इसमें निम्नलिखित प्रथाएँ शामिल हैं:
- फसल चक्रण: मृदा गुणवत्ता में ह्रास को रोकने के लिये क्रमिक रूप से विभिन्न फसलों की खेती करना।
- एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): व्यापक रासायनिक छिड़काव के बजाय प्राकृतिक परभक्षियों अथवा जैविक नियंत्रण उपायों का उपयोग करना।
- आवरण फसल उगाना: मृदा अपरदन को रोकने तथा मृदा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिये ‘जीवित मल्च’ के रूप में फसलें उगाना।
- आर्थिक लाभप्रदता: कृषि पद्धतियों का अस्तित्व आर्थिक रूप से व्यवहार्य होना आवश्यक है। सतत कृषि महंगे बाह्य इनपुट (जैसे: सिंथेटिक उर्वरक और आनुवंशिकतः रूपांतरित (GMO) बीज) पर निर्भरता को कम करती है, जिससे किसानों के परिचालन लागत में समय के साथ कमी आती है।
- सामाजिक समानता: श्रमिकों के साथ उचित व्यवहार सुनिश्चित करना और समुदाय को सुरक्षित, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना। यह स्थानीय खाद्य प्रणालियों का समर्थन करने तथा कृषि की सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने पर ज़ोर देता है।
- पर्यावरण स्वास्थ्य: यह मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और जैव विविधता के संरक्षण एवं सुधार पर केंद्रित है। इसमें निम्नलिखित प्रथाएँ शामिल हैं:
- सतत कृषि में प्रमुख पद्धतियाँ:
- परमाकल्चर और एग्रोफॉरेस्ट्री: परागणकर्त्ताओं के लिये आवास उपलब्ध कराने, कार्बन अवशोषण बढ़ाने तथा जल प्रवाह प्रबंधन हेतु कृषि परिदृश्य में वृक्षों एवं झाड़ियों को एकीकृत करना।
- न्यून जुताई: मृदा की संरचना को बनाए रखने और कार्बन को प्रभावी ढंग से संग्रहित करने के लिये मृदा की गड़बड़ी को कम करना।
- जल संरक्षण: ड्रिप सिंचाई प्रणाली जैसी परिशुद्ध सिंचाई तकनीकों का उपयोग करना, जो जल को सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुँचाकर अपव्यय को कम करती हैं।
- सतत कृषि की आवश्यकता:
- मृदा स्वास्थ्य और भूमि संरक्षण: फसल चक्र और जैविक खाद जैसी संधारणीय पद्धतियाँ मृदा सूक्ष्मजीवों एवं पोषक तत्त्वों को पुनर्स्थापित करती हैं। स्वस्थ मृदा कार्बन सिंक (कार्बन को अवशोषित करने) का कार्य करती है, वायुमंडलीय कार्बन को पृथक करती है और जलवायु परिवर्तन को कम करने में सहायता करती है।
- जल सुरक्षा और गुणवत्ता: ड्रिप सिंचाई और परिशुद्ध कृषि जैसी संधारणीय तकनीकें जल उपयोग को अनुकूलित करती हैं। विषाक्त रसायनों पर निर्भरता को समाप्त करके, सतत कृषि पेयजल स्रोतों के प्रदूषण को रोकती है तथा पोषक तत्त्वों के बहाव से उत्पन्न ‘मृत क्षेत्रों (Dead zone)‘ से जलीय पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करती है।
- जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की समुत्थानशक्ति: सतत कृषि कृषि-जैव विविधता को प्रोत्साहित करती है, जिसमें विभिन्न प्रकार की फसलों का रोपण तथा हरित अवरोधों का संरक्षण सम्मिलित है। इससे प्राकृतिक कीट नियंत्रण चक्र बनता है और परागणकर्त्ताओं की रक्षा होती है, जो विश्व की 75% से अधिक खाद्य फसलों के अस्तित्व के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- किसानों के लिये आर्थिक स्थिरता: स्थानीय संसाधनों (जैसे: जैविक खाद और स्वदेशी बीज) का उपयोग करके तथा उत्पादन में विविधता लाकर, सतत कृषि से लागत का अंतर कम होता है। इससे किसान अधिक आत्मनिर्भर बनते हैं और वैश्विक बाज़ार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होते हैं।
- पोषण और जन स्वास्थ्य: यह पोषक तत्त्वों से भरपूर फसलों को प्राथमिकता देता है और हमारी खाद्य शृंखला में कीटनाशक अवशेषों की उपस्थिति को न्यूनतम करती है। इससे रासायनिक संपर्क तथा असंतुलित आहार से जुड़ी दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं, जैसे: दीर्घकालिक रोगों, के समाधान में प्रत्यक्ष योगदान मिलता है।
भारत ने सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिये कौन-कौन से प्रमुख कदम उठाए हैं?
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना: RKVY, जिसे वर्ष 2007 में शुरू किया गया था, राज्यों को स्थान-विशिष्ट कृषि परियोजनाओं की योजना बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने का अधिकार देती है, जिससे विकेंद्रीकृत विकास को बढ़ावा मिलता है तथा इस क्षेत्र में निवेश बढ़ता है।
- इस दिशा में, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) कुशल जल और मृदा प्रबंधन के माध्यम से जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देता है, जिससे बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन एवं कृषि की व्यवहार्यता सुनिश्चित हो सके।
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): सरकार मृदा की सेहत को पुनर्स्थापित करने के लिये किसानों को रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर संक्रमण के लिये सक्रिय रूप से प्रयासरत है। परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) किसानों को जैविक पद्धतियों को अपनाने के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- वर्ष 2015 और 2025 के दौरान, जैविक खेती की पहलों का काफी विस्तार हुआ है, जिससे 15 लाख हेक्टेयर भूमि खेती के अंतर्गत आ गई है। 52,289 क्लस्टरों के गठन के माध्यम से, इन प्रयासों ने सफलतापूर्वक 25 लाख किसानों को सहायता प्रदान की है।
- राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (NMNF): नवंबर 2024 में शुरू किया गया प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF), किसानों को प्राकृतिक कृषि अंगीकरण और पशुपालन के लिये दो वर्ष तक प्रति एकड़ प्रति वर्ष ₹4,000 का प्रोत्साहन देता है। यह बाह्य रासायनिक इनपुट के स्थान पर खेत में ही उपलब्ध जैविक इनपुट (जैसे: गाय का गोबर और मूत्र) के उपयोग पर ज़ोर देता है।
- मार्च 2026 तक, 18,000 से अधिक क्लस्टर बनाए जा चुके हैं, जो 8.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं और 18.19 लाख किसानों को नामांकित करते हैं तथा मृदा में कार्बनिक कार्बन के स्तर में सुधार दर्ज किया गया है।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): यह योजना सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम) अपनाने के लिये सब्सिडी (लघु एवं सीमांत किसानों के लिये 55% तक) प्रदान करती है, जो पारंपरिक बाढ़ सिंचाई की तुलना में जल की बर्बादी को कम करती है।
- यह ‘हर बूंद से अधिक फसल (Per Drop More Crop)’ के आदर्श वाक्य के तहत सिंचाई दक्षता को बढ़ाता है।
- इस योजना का उद्देश्य जल उपयोग दक्षता को अनुकूलित करके, विशेष रूप से जल संकटग्रस्त ज़िलों में, 22 लाख किसानों को लाभ पहुँचाना है।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना: यह योजना किसानों को उनकी मृदा के प्रकार के लिये आवश्यक पोषक तत्त्वों की मात्रा पर विशिष्ट सिफारिशें प्रदान करते हुए, अनुकूलित मृदा स्वास्थ्य रिपोर्ट उपलब्ध कराती है।
- इससे किसानों ने यूरिया के ‘अंधाधुंध उपयोग’ से दूरी बना ली है, जिससे लागत में बचत हुई है और मृदा का अम्लीकरण कम हुआ है।
- इस योजना के अंतर्गत लगभग 20 करोड़ कार्ड जारी किये जा चुके हैं, लाखों जियो-टैग नमूनों के आधार पर राष्ट्रीय पोषक तत्त्व मानचित्र तैयार किया गया है तथा प्रयोगशालाओं, पोर्टलों और ऐसी डिजिटल प्रणाली की स्थापना की गई है, जो खेत-विशिष्ट उर्वरक सलाह प्रदान करने में सक्षम है।
- जलवायु परिवर्तन के लिये राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCC): राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) द्वारा प्रशासित और कार्यान्वित NAFCC की स्थापना वर्ष 2015 में उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूलन की लागत वहन करने हेतु की गई थी जो विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
- NAFCC जलवायु अनुकूलन से संबंधित ठोस परियोजनाओं का समर्थन करने के लिये राज्य सरकारों को 100% केंद्रीय अनुदान प्रदान करता है।
- NAFCC के तहत 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 30 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनकी कुल परियोजना लागत 847 करोड़ रुपये है।
- डिजिटल कृषि और e-NAM: राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) मंच किसानों को एक व्यापक, पारदर्शी बाज़ार से जोड़ता है, जबकि परिशुद्ध कृषि और फसल की स्थिति की वास्तविक काल की निगरानी के लिये डिजिटल उपकरणों का तेज़ी से उपयोग किया जा रहा है।
- वर्ष 2016 में शुरू किये गए e-NAM ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 1,650 से अधिक मंडियों को एकीकृत किया है।
- फरवरी 2026 तक, e-NAM प्लेटफॉर्म पर 1.80 करोड़ किसान और 2.72 लाख व्यापारी पंजीकृत हो चुके हैं।
- e-NAM पर 4,724 कृषक उत्पादक संगठनों (FPO) को शामिल किया गया है।
- e-NAM पर इसकी शुरुआत से लेकर फरवरी 2026 तक व्यापार किये गए कृषि उत्पादों की कुल मात्रा और मूल्य क्रमशः 13.22 करोड़ मीट्रिक टन एवं ₹4,82,350 करोड़ है।
- वर्ष 2016 में शुरू किये गए e-NAM ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 1,650 से अधिक मंडियों को एकीकृत किया है।
- PM-KUSUM (प्रधान मंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान): यह योजना कृषि क्षेत्र में स्वच्छ सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देती है, जिससे किसान डीज़ल से चलने वाले सिंचाई पंपों से दूर होकर सौर ऊर्जा की ओर रुख कर सकें।
- सौर ऊर्जा को एकीकृत करके, यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करता है, कृषि में लगने वाली लागत को कम करता है और किसानों को अतिरिक्त सौर ऊर्जा को ग्रिड को वापस बेचने की अनुमति देता है।
- यह विश्व की सबसे बड़ी पहलों में से एक है, जिसका उद्देश्य 35 लाख से अधिक किसानों को स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करना है।
भारत में सतत कृषि को अपनाने में कौन-कौन सी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं?
- श्रम-स्थिरता विरोधाभास: पुनर्योजी कृषि पद्धतियाँ (जैसे– मल्चिंग, खरपतवार का मैनुअल प्रबंधन तथा अंतरवर्ती फसल प्रणाली) शाकनाशी-आधारित ‘रासायनिक मॉडल’ की तुलना में अधिक श्रम-प्रधान होती हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन के कारण, खेतों में श्रम की कमी हो रही है। यदि सतत कृषि पद्धतियों को कुशलतापूर्वक मशीनीकृत नहीं किया जा सकता है, तो वे लघु किसानों के लिये अत्यधिक खर्चीली हो जाती हैं।
- भारत में कृषि मशीनीकरण अभी भी विकासशील अवस्था में है, उन्नत कृषि क्षेत्रों में यह केवल लगभग 40-45% तक ही पहुँचा है, जिसका अर्थ है कि ग्रामीण क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा अभी भी तेज़ी से महंगे होते जा रहे मैनुअल श्रम पर निर्भर है, जो रासायनिक खरपतवार-नाशकों की कम श्रम लागत के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये संघर्ष कर रहा है।
- मृदा कार्बन मुद्रीकरण अवसंरचना का अभाव: मृदा कार्बन पृथक्करण आय का एक संभावित स्रोत है, लेकिन लघु किसान इस बाज़ार से वंचित रह जाते हैं। निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) की उच्च प्रारंभिक लागत व्यक्तिगत किसानों को वैश्विक कार्बन क्रेडिट बाज़ारों तक पहुँचने से रोकती है।
- हालाँकि वर्ष 2050 तक भारतीय कार्बन बाज़ार का संभावित मूल्य कम से कम 50 अरब डॉलर होने का अनुमान है, लेकिन वर्तमान स्वैच्छिक बाज़ार उच्च पंजीकरण शुल्क और भूमि के विखंडन से बाधित हैं, जिससे 86% लघु या सीमांत किसानों के लिये प्रभावी ढंग से भाग लेना लगभग असंभव हो जाता है।
- उपभोक्ता मूल्य में शहरी-ग्रामीण असमानता: सतत कृषि को केवल एक विशिष्ट ‘विलासिता’ उत्पाद के स्थान पर एक सार्वजनिक सेवा के रूप में देखने में एक मूलभूत विफलता बनी हुई है।
- उपभोक्ता प्रायः ऑर्गेनिक लेबल को स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में देखते हैं, लेकिन उत्पादन की पारिस्थितिक लागत को समझने में विफल रहते हैं, जिससे कीमत के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न होती है।
- दिल्ली (NCR) में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि हालाँकि उपभोक्ता जैविक भोजन में रुचि रखते हैं, लेकिन संधारणीय प्रथाओं के ‘क्यों’ और ‘कैसे’ के बारे में उनका ज्ञान सीमित रहता है, जो संधारणीय उत्पादों को मुख्यधारा में लाने में बाधा डालता है।
- कृषि-तकनीक की ग्रीनवाशिंग: कुछ आधुनिक कृषि-तकनीक स्टार्टअप पारिस्थितिक संधारणीयता की ओर परिवर्तन के बजाय मौजूदा इनपुट-प्रधान औद्योगिक मॉडलों का डिजिटलीकरण कर रहे हैं।
- स्टार्टअप कंपनियाँ रासायनिक वितरण को अनुकूलित करके ‘संधारणीयता’ का दावा कर सकती हैं, जो औद्योगिक कृषि को ‘हरित’ रूप देने का कार्य करता है।
- इससे नीति निर्माताओं और किसानों दोनों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वे दक्षता (रसायनों का अनुकूलन) एवं परिवर्तन (रसायनों को कम करना) के बीच अंतर करने के लिये संघर्ष करते हैं।
- भूमि स्वामित्व और काश्तकारिता संबंधी हतोत्साहन: भारतीय कृषि का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा असुरक्षित, अल्पकालिक (प्रायः साल-दर-साल) पट्टों पर काश्तकार कृषकों द्वारा किया जाता है। मृदा सुधार एवं कृषि वानिकी जैसी प्रथाएँ दीर्घकालिक निवेश हैं।
- काश्तकारों के पास मृदा की गुणवत्ता में सुधार करने का कोई प्रोत्साहन नहीं होता क्योंकि दीर्घकालिक लाभ किसान को नहीं बल्कि भूमि स्वामियों को मिलता है।
- अध्ययनों से लगातार यह स्पष्ट हुआ है कि औपचारिक और दीर्घकालिक भूमि स्वामित्व रखने वाले कृषक, अनौपचारिक या अल्पकालिक व्यवस्था वाले कृषकों की तुलना में अधिक सतत भूमि प्रबंधन पद्धतियाँ अपनाते हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का अवमूल्यन: सतत कृषि पद्धतियाँ भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता समर्थन और नाइट्रोजन अपवाह में कमी जैसे सार्वजनिक लाभ प्रदान करती है, किंतु इन्हें वित्तीय रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।
- परंपरागत किसानों से उनके रासायनिक उपयोग के नकारात्मक बाह्य प्रभावों के लिये शुल्क नहीं लिया जाता है, न ही संधारणीय किसानों को उनके द्वारा उत्पन्न सकारात्मक बाह्य प्रभावों (जैसे, वन्यजीवों की गतिविधि में वृद्धि, जो पारिस्थितिक खेतों पर 30% अधिक हो सकती है) के लिये प्रोत्साहन दिया जाता है।
- वैश्विक अनुमानों से पता चलता है कि बेहतर पोषक तत्त्व प्रबंधन से वैश्विक स्तर पर 476 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सामाजिक लाभ मिल सकते हैं, लेकिन भारत में ‘नाइट्रोजन क्रेडिट सिस्टम’ या पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (PES) के लिये प्रत्यक्ष भुगतान व्यवस्था के अभाव में यह लाभ अप्राप्त रह जाता है और सतत कृषि व्यक्तिगत कृषक के लिये अतिरिक्त लागत वाली गतिविधि बन जाती है।
- परिशुद्ध कृषि में ‘डिजिटल डिवाइड’: हालाँकि भारत ने ग्रामीण कनेक्टिविटी में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है और वर्ष 2025 के अंत तक 1 बिलियन से अधिक ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन हो चुके हैं, फिर भी तकनीकी स्तर पर विभाजन बना हुआ है।
- स्मार्ट कृषि उपकरणों (AI, IoT सेंसर) के लिये उच्च गति, स्थिर डेटा एवं तकनीकी साक्षरता की आवश्यकता होती है। यद्यपि मूलभूत संपर्क बढ़ रहा है, परंतु जटिल डेटा-आधारित कृषि प्रबंधन अभी भी बड़े या कॉर्पोरेट कृषि क्षेत्रों तक सीमित है।
- डेटा लागत में कमी के बावजूद लघु कृषक, जिनके पास तकनीकी प्रशिक्षण तथा उन्नत अवसंरचना का अभाव है, इस संपर्क को उत्पादकता-वृद्धि के प्रभावी साधनों में परिवर्तित नहीं कर पा रहे हैं, जिससे ‘संधारणीयता अंतराल’ बढ़ने का जोखिम उत्पन्न होता है।
- असममित कोल्ड चेन तथा कटाई-पश्चात् अवसंरचना: संधारणीय और जैविक उत्पादों में प्रायः पारंपरिक औद्योगिक खेती की भांति प्रयुक्त होने वाले मज़बूत, रासायनिक परिरक्षक सुरक्षा संजाल का अभाव होता है, जिससे वे शीघ्र नष्ट होने वाले बन जाते हैं।
- भारत की वर्तमान कटाई-पश्चात् लॉजिस्टिक्स, शीत भंडारण तथा आपूर्ति शृंखलाएँ मुख्यतः बड़े पैमाने पर उत्पादित, एकरूप तथा रासायनिक रूप से संरक्षित वस्तुओं के लिये विकसित की गई हैं।
- समर्पित पृथक आपूर्ति तंत्र के अभाव में सतत रूप से उगाई गई फसलें सामान्य उत्पादों में मिश्रित हो जाती हैं या प्रीमियम बाज़ारों तक पहुँचने से पहले इन फसलों के खराब हो जाने का खतरा रहता है।
- उदाहरण के लिये, NABCON द्वारा वर्ष 2020 से 2022 के दौरान किये गए बड़े पैमाने के अध्ययन के अनुसार, भारत को प्रति वर्ष लगभग ₹1.53 ट्रिलियन (18.5 बिलियन डॉलर) के खाद्य नुकसान का सामना करना पड़ता है।
- भारत की वर्तमान कटाई-पश्चात् लॉजिस्टिक्स, शीत भंडारण तथा आपूर्ति शृंखलाएँ मुख्यतः बड़े पैमाने पर उत्पादित, एकरूप तथा रासायनिक रूप से संरक्षित वस्तुओं के लिये विकसित की गई हैं।
- सब्सिडी के कारण रासायनिक उर्वरकों को प्राथमिकता: सतत कृषि की ओर संक्रमण में एक बड़ी बाधा इनपुट सब्सिडी द्वारा निर्मित असंतुलन है।
- जहाँ फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों के मूल्य आंशिक रूप से बाज़ार से जुड़े हुए हैं, वहीं यूरिया अभी भी सरकार द्वारा अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त तथा मूल्य-नियंत्रित उर्वरक बना हुआ है।
- इससे जैविक और जैव-आधारित विकल्पों की तुलना में रासायनिक नाइट्रोजन काफी सस्ता हो जाता है, जिससे किसान सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने से हतोत्साहित होते हैं।
- इस निरंतर निर्भरता को देखते हुए, सरकार ने सत्र 2025-26 के लिये संशोधित उर्वरक सब्सिडी अनुमान को 1.68 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये कर दिया है।
भारत में सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- वित्तीय प्रोत्साहनों और सब्सिडी को पुनर्व्यवस्थित करना: इनपुट पर सब्सिडी देने के बजाय, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) आधारित व्यवस्था अपनाई जानी चाहिये, जिसमें किसानों को विशिष्ट पर्यावरणीय परिणामों के लिये प्रोत्साहित किया जाये, जैसे: मृदा में जैविक कार्बन स्तर में सुधार, जल संरक्षण अथवा जैव विविधता में वृद्धि।
- चूँकि सतत अथवा जैविक कृषि पद्धतियों की ओर संक्रमण के दौरान प्रायः 3–5 वर्षों तक उत्पादन में कमी देखी जाती है, अतः सरकार को इस संक्रमण अवधि के प्रभाव को कम करने के लिये प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करनी चाहिये, ताकि किसान तात्कालिक आर्थिक दबाव के कारण पुनः पारंपरिक तथा रासायनिक-प्रधान कृषि रासायनिक-प्रधान पद्धतियों की ओर वापस न लौटें।
- ज़मीनी स्तर पर विस्तार और अवधारणा के प्रमाण को मज़बूत करना: ‘देखकर विश्वास करना’ मॉडल कृषि व्यवहारों में परिवर्तन लाने का सर्वाधिक प्रभावी माध्यम है।
- कक्षा-आधारित प्रशिक्षण के स्थान पर ‘किसान-से-किसान’ अधिगम तथा खेत-स्तरीय प्रदर्शन को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिये। किसानों की अपनी भूमि पर पारंपरिक तथा सतत कृषि पद्धतियों की तुलनात्मक प्रस्तुति के माध्यम से शोधकर्त्ता उत्पादकता तथा लागत बचत के संबंध में व्यावहारिक एवं स्थानीय प्रमाण उपलब्ध करा सकते हैं।
- प्रमाणन का डिजिटलीकरण और सरलीकरण: सहभागिता गारंटी प्रणाली (PGS-इंडिया) जैसे समूह-आधारित प्रमाणन मॉडलों का विस्तार तथा अनुदानीकरण किया जाना चाहिये, जो लघु किसानों के समूहों को तृतीय-पक्ष प्रमाणन की लागत के एक अंश पर एक-दूसरे की प्रथाओं को सत्यापित करने की अनुमति देता है।
- पारदर्शी और कम लागत वाली ट्रेसबिलिटी की व्यवस्था के लिये ब्लॉकचेन या सरल मोबाइल-आधारित डिजिटल लॉग का उपयोग किया जाना चाहिये।
- इससे छोटे कृषकों को बिना महँगे मध्यस्थों पर निर्भर हुए यह प्रमाणित करने में सहायता मिलेगी कि उनका उत्पादन सतत कृषि पद्धति से किया गया है और वे प्रीमियम निर्यात अथवा शहरी बाज़ारों तक पहुँच प्राप्त कर सकेंगे।
- बाज़ार संपर्क और अवसंरचना में सुधार: गाँव या समूह स्तर पर सौर ऊर्जा से चलने वाली विकेंद्रीकृत शीत भंडारण इकाइयों में निवेश किया जाना चाहिये। इससे फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है— जो वर्तमान में भारत में 16% से 20% तक है और किसानों को बेहतर बाज़ार मूल्य के लिये अपनी उपज को रोककर रखने की सौदेबाजी की शक्ति मिलती है।
- ऐसे किसान संगठनों (FPO) के गठन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ताकि लघु किसान सामूहिक स्तर पर उत्पादन का संकलन कर सकें, बेहतर मूल्य पर सौदाकरी कर सकें तथा सामुदायिक कंपोस्टिंग अथवा लेज़र भूमि समतलीकरण जैसी साझा सतत प्रौद्योगिकियों में निवेश कर सकें।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति समुत्थानशील अवसंरचना में निवेश: PM-KUSUM जैसी पहलों का विस्तार किया जाना चाहिये, जो सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई उपलब्ध कराती हैं।
- इससे जीवाश्म ईंधन से चलने वाले पंपों पर निर्भरता कम होती है और जल के कुशल उपयोग को प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि सौर ऊर्जा दिन भर एक सीमित संसाधन है।
- अनुसंधान और बीज संप्रभुता का समर्थन: जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, स्थानीय किस्मों को संरक्षित करने वाले क्षेत्रीय बीज बैंकों में निवेश किया जाना चाहिये। इन बीजों को प्रायः कम रासायनिक इनपुट की आवश्यकता होती है और ये स्थानीय जलवायु परिवर्तनों के लिये बेहतर अनुकूल होते हैं।
- 10+ वर्षों की अवधि में पारंपरिक एवं सतत कृषि की तुलना करने वाले अकादमिक और संस्थागत अनुसंधान के समर्थन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। वर्तमान में, अधिकांश प्रमाण अल्पकालिक हैं; यह सिद्ध करने के लिये दीर्घकालिक डेटा आवश्यक है कि संधारणीय प्रणालियाँ न केवल ‘पर्यावरण-अनुकूल’ हैं, बल्कि दीर्घकालिक रूप से अधिक लाभदायक और स्थिर भी हैं।
निष्कर्ष
जलवायु जोखिमों को कम करने तथा दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये भारत को सतत कृषि की ओर संक्रमण करना आवश्यक है। इनपुट-आधारित सब्सिडी से परे परिणाम-उन्मुख पारिस्थितिकी तंत्र भुगतान की ओर अग्रसर होकर, स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल अवसंरचना में निवेश करके और कृषक सहयोग संगठनों (FPO) के माध्यम से लघु किसानों को सशक्त बनाकर, भारत एक ऐसा कृषि मॉडल विकसित कर सकता है जो पारिस्थितिक रूप से पुनर्जीवित होने के साथ-साथ किसानों के लिये आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य हो।






