
केंद्रीय श्रम एवं रोज़गार राज्य मंत्री ने जिनेवा में 114वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, जहाँ भारत ने अपने श्रम संबंधी सुधारों, विस्तारित सामाजिक सुरक्षा पहलों और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का प्रदर्शन किया।
- हालाँकि चार श्रम संहिताओं के अधिनियमन के बावजूद, कमज़ोर कार्यान्वयन, अपर्याप्त प्रवर्तन और अनौपचारिक तथा गिग वर्कर्स के सीमित कवरेज जैसी चिंताएँ बनी हुई हैं, जिससे श्रमबल का एक बड़ा वर्ग असुरक्षित रह गया है।
सारांश
- भारत ने 114वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) में अपने श्रम संबंधी सुधारों, विस्तारित सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का प्रदर्शन किया, जिसमें ई-श्रम पोर्टल तथा श्रम संबंधी संहिताओं जैसी पहलों के माध्यम से बेहतर रोज़गार संकेतकों एवं व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज पर प्रकाश डाला गया।
- इन उपलब्धियों के बावजूद, श्रम संबंधी संहिताओं के कमज़ोर कार्यान्वयन, गिग और अनौपचारिक श्रमिकों के लिये अपर्याप्त संरक्षण, मज़दूरी में स्थिरता (वृद्धि का अभाव), सीमित सामूहिक सौदेबाज़ी अधिकार तथा मज़बूत सामाजिक सुरक्षा और श्रम कल्याण तंत्र की आवश्यकता जैसी चिंताएँ बनी हुई हैं।
114वें ILC में भारत के संबोधन की मुख्य बातें क्या हैं?
- श्रम संबंधी कानूनों का समेकन: भारत ने “अंत्योदय” (सबसे कमज़ोर को ऊपर उठाना) के सिद्धांत द्वारा निर्देशित अपने व्यापक श्रम सुधारों पर प्रकाश डाला, जिसने 29 पुराने केंद्रीय श्रम संबंधी कानूनों को चार आधुनिक श्रम संहिताओं में समेकित कर अनुपालन को सरल बनाया और कल्याण को मज़बूत किया।
- रोज़गार एवं रोज़गार क्षमता मेट्रिक्स में वृद्धि:
- युवा रोज़गार क्षमता: वर्ष 2014 में 34% से बढ़कर वर्ष 2025 में 56% से अधिक हो गई।
- बेरोज़गारी दर: वर्ष 2017 में 6% से काफी कम होकर वर्ष 2025 में 3.1% पर आ गई।
- महिलाओं की श्रम बल भागीदारी: 22% से बढ़कर 38.8% हो गई।
- सामाजिक सुरक्षा का व्यापक विस्तार: भारत ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) को अवगत कराया कि सामाजिक सुरक्षा कवरेज वर्ष 2015 में 19% से बढ़कर वर्ष 2025 में 64.3% हो गई है।
- ILO के अनुमानों के अनुसार, यह अब लगभग 1,001 मिलियन (1 बिलियन) लोगों को कवर करता है।
- सॉफ्टपॉवर के रूप में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): राष्ट्रीय कॅरियर सेवा पोर्टल और ई-श्रम पोर्टल को स्केलेबल डिजिटल पब्लिक गुड्स के रूप में प्रदर्शित किया गया।
- रवांडा और श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय बैठकों के दौरान, भारत ने कार्यबल योजना तथा औपचारिकीकरण के लिये समान डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने हेतु तकनीकी सहायता का विस्तार किया।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम गतिशीलता: भारत ने घरेलू कौशल को वैश्विक रोज़गार के अवसरों से जोड़ने के लिये संपूर्ण-सरकारी दृष्टिकोण पर बल दिया, जिसमें व्यवसायों के अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ वर्गीकरण को विकसित करने के लिये ILO के साथ चल रहा व्यवहार्यता अध्ययन शामिल है।
- नवीन पहलें: तीव्र रोज़गार सृजन को बढ़ावा देने के लिये प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना के शुभारंभ पर प्रकाश डाला गया।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC)
- परिचय: अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला और विचार-विमर्श करने वाला निकाय है, जो संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष एजेंसी है।
- अक्सर “श्रम की अंतर्राष्ट्रीय संसद” के रूप में संदर्भित, ILC की बैठक हर साल आमतौर पर जून में जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में होती है, जिसका उद्देश्य वैश्विक श्रम मानक तय करना, काम की दुनिया से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करना और ILO की व्यापक नीतियों को आकार देना है।
- विशिष्ट त्रिपक्षीय संरचना: ऐसे अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के विपरीत जहाँ केवल सरकारों को मतदान का अधिकार होता है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) एक त्रिपक्षीय सांगठनिक ढाँचे का अनुसरण करता है।
- प्रत्येक सदस्य देश दो सरकारी प्रतिनिधि, एक नियोक्ता प्रतिनिधि और एक श्रमिक प्रतिनिधि भेजता है तथा इन सभी के पास स्वतंत्र मतदान का अधिकार होता है।
- यह नियोक्ताओं और श्रमिकों को अपनी सरकारों से अलग मतदान करने की अनुमति देता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों में श्रम तथा उद्योग के हितों का सीधा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
न्यू लेबर कोड
- मज़दूरी संहिता, 2019: यह संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के सभी कर्मचारियों के लिये न्यूनतम मज़दूरी तथा समय पर मज़दूरी के भुगतान के प्रावधान को सार्वभौमिक बनाता है।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: यह विवाद समाधान को सरल बनाता है, ट्रेड यूनियन की मान्यता के नियमों में संशोधन करता है तथा ले-ऑफ (कामबंदी), छँटनी एवं तालाबंदी/बंदी की शर्तों को संशोधित करता है।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: यह ESIC (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) और EPFO (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) की पहुँच का विस्तार करती है।
- यह भारत में पहला कानूनी ढाँचा है जो सैद्धांतिक रूप से गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा जाल में लाने का प्रावधान करता है।
- व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति (OSH) संहिता, 2020: यह स्वास्थ्य तथा सुरक्षा स्थितियों को नियंत्रित करती है, जिसमें विशेष रूप से अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों एवं अनुबंध श्रमिकों से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया है।

नए श्रम सुधारों के बावजूद भारतीय श्रम शक्ति अभी भी असुरक्षित क्यों है?
- कानूनी अनिश्चितता (ग्रे ज़ोन) में गिग श्रमिक: यद्यपि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों का उल्लेख है, तथापि यह उन्हें औपचारिक/मानक “कर्मचारी” के रूप में मान्यता प्रदान करने से बचती है।
- नियोक्ता-कर्मचारी के बीच किसी औपचारिक संबंध के न होने के कारण, इन्हें औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति (OSH) संहिता, 2020 के दायरे से बाहर रखा गया है, जिसके फलस्वरूप ये न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी तथा कार्यस्थल पर सुरक्षा संबंधी अधिकारों से वंचित हो जाते हैं।
- एल्गोरिथमिक अत्याचार: डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स श्रमिकों को पूरी तरह से स्वचालित (ऑटोमेटेड) कार्यस्थल का सामना करना पड़ता है। स्वचालित रेटिंग, प्रदर्शन के पूर्ण मानक और डार्क-स्टोर आवंटन से जुड़े अपारदर्शी सॉफ्टवेयर बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप या विवाद निवारण तंत्र के, उनकी दैनिक आय और जुर्माने का निर्धारण करते हैं।
- प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर्स (कंपनियाँ) अक्सर कार्य-आधारित वेतन संरचना में एकतरफा बदलाव करते हैं, जिससे परिचालन खर्चों को कम करने के लिये प्रति-डिलीवरी या प्रति-राइड मिलने वाले मूल भुगतान में व्यवस्थित रूप से कटौती की जाती है।
- ‘हायर एंड फायर’ (भर्ती और छँटनी) के लिये उच्च सीमा: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने कंपनियों/प्रतिष्ठानों के लिये बंद होने, कामबंदी (ले-ऑफ) या छँटनी से पहले सरकार से पूर्व अनुमति लेने की श्रमिक सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर दिया है।
- यह ‘हायर एंड फायर’ (भर्ती और छँटनी) की एक अत्यंत अनुकूलनीय व्यवस्था तैयार करता है, जिससे एमएसएमई (MSMEs) में काम करने वाले करोड़ों श्रमिक रोज़गार सुरक्षा से वंचित हो जाते हैं।
- कार्य समय की “अनुकूल व्यवस्था” का शोषण: हालाँकि OSH संहिता, 2020 व्यापक रूप से प्रति सप्ताह 48 घंटे कार्य करने के नियम को लागू करती है, लेकिन यह दैनिक शिफ्ट की सीमा, अनिवार्य विश्राम अंतराल और काम के फैलाव की अधिकतम अवधि को अस्पष्ट छोड़ देती है।
- इस वैधानिक अनिश्चितता का लाभ उठाकर नियोक्ता, संकुचित 4-दिवसीय कार्य सप्ताह में परिवर्तन का बहाना बनाकर, श्रमिकों से 12-12 घंटे की कठिन शिफ्ट में काम करा रहे हैं और इसके बदले दिये जाने वाले अनिवार्य ओवरटाइम भत्ते की अदायगी से साफ बच निकलते हैं।
- सामूहिक सौदेबाज़ी (कलेक्टिव बारगेनिंग) का कमज़ोर पड़ना: नए नियम ट्रेड यूनियनों को एकमात्र वार्ताकार एजेंट के रूप में मान्यता देने की सीमा को बढ़ा देते हैं।
- किसी संघ (यूनियन) के लिये अब मस्टर रोल पर दर्ज 51 प्रतिशत श्रमिकों का समर्थन प्राप्त करना अनिवार्य है, जिसके कारण असंगठित एवं अनुबंध श्रमिकों के लिये संघबद्ध होना तथा सामूहिक रूप से वार्ता करना अत्यंत दुष्कर हो जाता है।
- यह संहिता हड़ताल करने से पूर्व 60 दिवस की अनिवार्य नोटिस अवधि का प्रावधान करती है तथा सक्रिय सुलह कार्यवाहियों के दौरान हड़ताल को पूर्णतः प्रतिबंधित करती है, जिससे औद्योगिक कार्रवाई के संवैधानिक एवं कानूनी कार्यक्षेत्र में प्रभावी रूप से संकुचन आता है।
- OSH के अनुप्रयोग का बहिष्करण दायरा: OSH संहिता, 2020 मुख्य रूप से केवल उन्हीं प्रतिष्ठानों (कंपनियों) पर लागू होती है जहाँ 10 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हैं।
- इसके परिणामस्वरूप भारत के अधिकांश अनौपचारिक क्षेत्र और सूक्ष्म उद्यम बुनियादी सुरक्षा अधिदेशों तथा निरीक्षणों के दायरे से स्वतः ही बाहर हो जाते हैं।
- डिजिटल डेटा का वास्तविक लाभों में परिवर्तन: हालाँकि ई-श्रम पोर्टल डेटा संग्रह के मामले में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है (जिसमें करोड़ों असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण किया गया है), लेकिन इस डेटाबेस को वास्तविक, अंतिम छोर तक मिलने वाले कल्याणकारी लाभों (जैसे- पेंशन, स्वास्थ्य सेवा और ऋण राहत) में बदलना अभी भी विभिन्न राज्यों में काफी असंगत (असमसमान) बना हुआ है।
- महंँगाई से प्रेरित मज़दूरी स्थिरता: भारत में न्यूनतम मज़दूरी प्रणाली एक दोहरे घटक वाले ढाँचे पर काम करती है, जिसमें एक मूल वेतन (जिसमें प्रति पाँच वर्ष में संशोधन होता है) और औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) से जुड़ा एक परिवर्तनीय महंँगाई भत्ता (VDA) शामिल होता है, जिसे वर्ष में दो बार अपडेट किया जाता है।
- वर्ष 2021 से 2026 के मध्य, औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) में लगभग 25 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि दर्ज की गई। यद्यपि विभिन्न राज्यों द्वारा मुद्रास्फीति से संबद्ध परिवर्तनीय महंँगाई भत्ते (VDA) में संशोधन किया गया है, तथापि मौलिक आधारभूत मज़दूरी (बेस वेज) को अद्यतित करने में उनके द्वारा लगातार विलंब किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वास्तविक मज़दूरी का गंभीर अवमूल्यन (कमी) हुआ है।
- प्रवासी श्रमिकों पर सामाजिक-आर्थिक दबाव: कारखाने के कर्मचारी, जिनमें से अधिकांश अंतर-राज्यीय प्रवासी (एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर काम करने वाले) हैं, एक स्थानीयकृत जीवन-यापन लागत संकट का सामना कर रहे हैं।
- शहरी क्षेत्रों में कमरों के बढ़ते किराये, खाद्य पदार्थों की अस्थिर (घटती-बढ़ती) महंँगाई और अनौपचारिक व कालाबाज़ारी वाली आवश्यक वस्तुओं (जैसे अत्यधिक महंँगी दरों पर मिलने वाले समानांतर-बाज़ार के LPG सिलेंडर) पर मजबूरन निर्भरता ने नाममात्र की वेतन वृद्धि को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है।
श्रमिक कल्याण को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- नए श्रमिक वर्ग की परिभाषा: भारत को केवल ‘कर्मचारी’ और ‘स्वतंत्र संविदाकार’ के द्विआधारी ढाँचे से आगे बढ़ना होगा। यूरोपीय संघ के प्लेटफॉर्म वर्क डायरेक्टिव से प्रेरणा लेते हुए, भारत को कानूनी रूप से एक ‘निर्भर संविदाकार’ या ‘प्लेटफार्म कार्यकर्त्ता’ श्रेणी स्थापित करनी चाहिये, जो न्यूनतम आधार वेतन की गारंटी दे, चाहे उनके पीस-रेट या काम के आधार पर भुगतान में उतार-चढ़ाव हो।
- राजस्थान मॉडल अपनाना: ‘राजस्थान प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स एक्ट, 2023’ की मुख्य विशेषताओं को लागू करें, जिसमें गिग वर्करों के प्रतिनिधित्व वाला एक वेलफेयर बोर्ड और प्लेटफॉर्म ट्रांज़ैक्शन से कल्याण शुल्क (वेलफेयर सेस इकट्ठा) करना शामिल है।
- डिजिटल अनुपालन को प्रोत्साहित करना: निरीक्षक-केंद्रित प्रवर्तन की जगह डेटा-संचालित निगरानी अपनाएँ, जैसे डिजिटल वेतन भुगतान और इलेक्ट्रॉनिक रोज़गार रिकॉर्ड।
- e-श्रम का क्रियात्मक समन्वय: e-श्रम डेटाबेस की अद्वितीय सफलता का अब सक्रिय कल्याण वितरण के लिये उपयोग किया जाना चाहिये, ताकि योजनाएँ सीधे श्रमिकों तक पहुँच सकें।
- पोर्टल को डिजिटल रूप से समन्वित करना: इसे एक राष्ट्र एक राशन कार्ड (ONORC), आयुष्मान भारत और PM-SYM के साथ एल्गोरिदमिक रूप से लिंक किया जाना चाहिये, ताकि वैश्विक आपूर्ति शृंखला संकट या महामारी के समय प्रवासी श्रमिकों के लिये तुरंत लक्षित वित्तीय राहत, आवास लाभ और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
- भारतीय श्रम सम्मेलन का पुनर्जीवन: घरेलू भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) को सक्रिय रूप से बुलाया जाना चाहिये, ताकि राज्य, नियोक्ता संघ और श्रमिक संघों के बीच वास्तविक संवाद को प्रोत्साहित किया जा सके।
- यह सुनिश्चित करना कि असंगठित और संविदा श्रमिकों के हितों का उपयुक्त प्रतिनिधित्व हो, औद्योगिक संघर्ष को विरोध प्रदर्शन में बदलने से पहले ही कम करने में सहायक होगा।
निष्कर्ष
भारत में चार श्रम संहिता के माध्यम से श्रम सुधार प्रतिस्पर्द्धात्मकता और आर्थिक विकास को बढ़ाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं। हालाँकि इनकी सफलता विशाल असंगठित और गिग श्रमिक वर्कफोर्स तक सामाजिक सुरक्षा, उचित वेतन तथा गरिमापूर्ण कार्य वातावरण उपलब्ध कराने पर निर्भर करती है। विकसित भारत 2047 प्राप्त करने के लिये श्रम बाज़ार की अनुकूलनशीलता को श्रमिक कल्याण के साथ संतुलित करना आवश्यक है, ताकि आर्थिक प्रगति समावेशी और न्यायसंगत विकास में परिवर्तित हो सके।
