स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) (एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय संस्थान) ने SIPRI ईयरबुक 2026 जारी किया, जो वैश्विक हथियार, निरस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन करता है।
इस रिपोर्ट में यह उजागर किया गया है कि भारत ने अपने परमाणु शस्त्र भंडार का विस्तार किया है और एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के तहत अपनी कुछ परमाणु युद्ध सिरों को पहली बार परिचालन स्थिति में रखा है।
SIPRI ईयरबुक 2026 की मुख्य बातें क्या हैं?
भारत
- पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश: रक्षा बजट के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर पाँचवें स्थान पर है। वर्ष 2025 में अमेरिका, चीन, रूस और जर्मनी के बाद भारत, विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा। वर्ष 2024 की तुलना में भारत के रक्षा व्यय में 8.9% की वृद्धि दर्ज की गई, जिसके साथ ही यह 92.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुँच गया।
- वर्ष 2025 में भारत का सुरक्षा वातावरण पाकिस्तान के साथ समवर्ती परमाणु प्रतिद्वंद्विता, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा और बहुपक्षीय सुरक्षा ढाँचे के व्यापक रूप से प्रभावित रहा है।
- प्रमुख हथियारों का बड़ा आयातक: वर्ष 2021-25 के दौरान भारत वैश्विक स्तर पर यूक्रेन के बाद प्रमुख हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक रहा। वैश्विक हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 8.2% थी।
- परमाणु शस्त्रागार: जनवरी 2026 तक, भारत के परमाणु शस्त्रागार में अनुमानित 190 परमाणु युद्धशीर्ष थे (जिसमें 12 तैनात और 178 रिज़र्व/स्टोरेज में थे), जबकि इसके मुकाबले चीन के पास 620 युद्धशीर्ष और पाकिस्तान के पास 170 युद्धशीर्ष थे।
- साइबर युद्ध का एकीकरण: रिपोर्ट में मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव (“ऑपरेशन सिंदूर“) का उल्लेख किया गया। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया कि दोनों देशों ने पहली बार सक्रिय सैन्य संघर्ष में साइबर ऑपरेशंस को शामिल किया, जो दक्षिण एशिया में ‘निवारक क्षमता’ के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है।
वैश्विक
- परमाणु हथियारों पर बढ़ती निर्भरता: नौ परमाणु-सशस्त्र देश—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इज़रायल—लगातार अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहे हैं तथा राष्ट्रीय शक्ति के माध्यम के रूप में परमाणु हथियारों पर अपनी निर्भरता को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं।
- जून 2025 में, नाटो सदस्य देश 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 5.0% के एक नए सैन्य खर्च लक्ष्य पर सहमत हुए, जो वर्ष 2014 में निर्धारित पिछले 2.0% के बेंचमार्क (मानक) से काफी अधिक है।
- यूक्रेन का सैन्य व्यय विश्व में सबसे अधिक था, जो उसकी कुल GDP का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
- वैश्विक सूची (Global Inventory): विश्व भर में अनुमानित 12,187 परमाणु युद्धशीर्षों में से लगभग 9,745 संभावित उपयोग के लिये सैन्य स्टॉकपाइल (भंडार) में हैं, जिनमें से 4,000 से अधिक युद्धशीर्षों को मिसाइलों और विमानों के साथ तैनात किया गया है।
- अमेरिका-रूस प्रभुत्व और जोखिम: अमेरिका और रूस के पास दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का लगभग 86% हिस्सा है।
- दोनों ही देशों में बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण के कार्यक्रम चल रहे हैं, जो चिंताजनक है क्योंकि न्यू स्टार्ट ट्रीटी फरवरी 2026 में समाप्त हो गई और अभी तक इसका कोई विकल्प सामने नहीं आया है।
- निःशस्त्रीकरण की धीमी गति: विश्व में कुल परमाणु हथियारों की संख्या में कमी आ रही है, क्योंकि अमेरिका और रूस शीत युद्ध (Cold War) के समय के पुराने हथियारों को नष्ट कर रहे हैं।
- हालाँकि यह कमी धीमी हो गई है क्योंकि देश अपने भंडार में नए और आधुनिक हथियार भी शामिल कर रहे हैं।
- शांतिरक्षा ढाँचे: मार्च 2025 में, लिथुआनिया मानवीय हथियार नियंत्रण संधि (Convention on Cluster Munitions) से बाहर निकलने वाला पहला देश बन गया।
- इसके अलावा, पाँच यूरोपीय देशों—एस्टोनिया, फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया और पोलैंड—ने एंटी-पर्सनल माइन कन्वेंशन से भी अपना नाम वापस ले लिया।
- सशस्त्र संघर्ष: साल 2025 में सबसे अधिक मौतें यूक्रेन में दर्ज की गईं, इसके बाद गाज़ा का स्थान रहा।
- AI और उभरती तकनीकें:
- युद्धक्षेत्र में उपयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से लक्ष्य निर्धारण और स्वचालित हथियार प्रणालियाँ अब गाज़ा तथा यूक्रेन जैसे सक्रिय संघर्ष क्षेत्रों में नियमित रूप से प्रयुक्त हो रही हैं।
- ड्रोन युद्ध का उदय: ड्रोन और फर्स्ट-पर्सन-व्यू (FPV) मानव रहित हवाई वाहन (UAVs) आधुनिक युद्ध की रणनीतियों को पूरी तरह बदल रहे हैं।
- ऑपरेशन स्पाइडर वेब : जून 2025 में, यूक्रेन ने 100 से अधिक तस्करी किये गए ड्रोन का उपयोग कर रूसी विमानों को नुकसान पहुँचाया, जिससे UAVs की असमान शक्ति का प्रदर्शन हुआ।
भारत का परमाणु सिद्धांत क्या है?
- परिचय: भारत ने आधिकारिक रूप से अपने परमाणु सिद्धांत को वर्ष 2003 में अपनाया। इसकी मूल नीति “नो फर्स्ट यूज़” (NFU) की प्रतिबद्धता पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि भारत परमाणु हथियारों का उपयोग केवल भारतीय क्षेत्र या भारतीय सेना पर परमाणु हमले के जवाबी कार्रवाई में करेगा।
- भारत के परमाणु सिद्धांत के मूल सिद्धांत:
- विश्वसनीय न्यूनतम विरोध: भारत का लक्ष्य पर्याप्त शस्त्रागार बनाए रखना है ताकि किसी भी विरोधी को यह विश्वास हो सके कि भारत के खिलाफ परमाणु हमला शुरू करने की कीमत असहनीय और अग्राह्य होगी। यह प्रतिरोध किसी एक विशिष्ट देश के खिलाफ लक्षित नहीं है।
- नो फर्स्ट यूज़ (NFU): भारत प्रतिबद्ध है कि वह परमाणु शस्त्रों का उपयोग केवल भारतीय क्षेत्र पर या कहीं भी भारतीय सेना पर परमाणु हमले की प्रतिक्रिया में करेगा।
- बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई: यदि भारत के खिलाफ परमाणु हमला किया जाता है, तो प्रतिक्रिया “बड़े पैमाने पर” होगी, जिससे आक्रामक को अपूरणीय और अस्वीकार्य क्षति पहुँचाई जाएगी। यह परस्पर सुनिश्चित विनाश (MAD) की अवधारणा पर आधारित है।
- कठोर नागरिक राजनीतिक नियंत्रण: परमाणु जवाबी हमले का आदेश देने का अधिकार पूरी तरह से नागरिक राजनीतिक नेतृत्व के पास है, जो परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA) के माध्यम से होता है।
- परमाणु कमान प्राधिकरण में एक राजनीतिक परिषद और एक कार्यकारी परिषद शामिल है।
- राजनीतिक परिषद: प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, यह परमाणु हथियारों के उपयोग को अधिकृत करने वाली एकमात्र संस्था है।
- कार्यकारी परिषद: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अध्यक्षता में, यह राजनीतिक परिषद को इनपुट प्रदान करती है और उसके निर्देशों का कार्यान्वयन करती है।
- सशर्त उपयोग / नकारात्मक सुरक्षा आश्वासन: भारत गैर-परमाणु हथियार राज्यों (NNWS) के खिलाफ परमाणु शस्त्रों का उपयोग न करने की प्रतिज्ञा करता है।
- हालाँकि भारत अपने खिलाफ एक बड़े रासायनिक या जैविक हथियार (CBW) हमले की स्थिति में परमाणु हथियारों के साथ जवाबी कार्रवाई करने का विकल्प सुरक्षित रखता है।
- निरस्त्रीकरण के लिये प्रतिबद्धता: भारत परमाणु परीक्षणों पर रोक बनाए रखता है और सत्यापन योग्य एवं गैर-भेदभावपूर्ण निरस्त्रीकरण के माध्यम से परमाणु हथियारों के वैश्विक उन्मूलन का समर्थन करता है।
भारत की परमाणु नीति का विकास
- शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम (1947–1974): भारत की परमाणु यात्रा ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर केंद्रित रही, जिसका नेतृत्व भौतिक विज्ञानी होमी जे. भाभा और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया।
- चीन (जिसने वर्ष 1964 में अपना स्वयं का परमाणु शस्त्र परीक्षण किया) से बढ़ते सुरक्षा खतरों के कारण भारत ने 18 मई, 1974 को अपने पहले फिज़न डिवाइस का परीक्षण किया।
- “स्माइलिंग बुद्धा” (जिसे आधिकारिक तौर पर पोखरण-I नामित किया गया) भारत का पहला सफल परमाणु हथियार परीक्षण था, जो 18 मई, 1974 को राजस्थान के थार रेगिस्तान में पोखरण परीक्षण रेंज पर किया गया था।
- भारत ने इस घटना को आधिकारिक रूप से शस्त्र परीक्षण नहीं मानते हुए इसे ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ (PNE) घोषित किया।
- शस्त्रीकरण (1974–1998): वर्ष 1974 के बाद, भारत को तीव्र अंतर्राष्ट्रीय दबाव, प्रतिबंधों और परमाणु आपूर्तिकर्त्ता समूह (NSG) के गठन का सामना करना पड़ा, जिसे भारत के परमाणु व्यापार को प्रतिबंधित करने के लिये डिज़ाइन किया गया था।
- साथ ही, परमाणु शस्त्रों से संपन्न चीन और उभरते चीन-पाकिस्तान परमाणु गठबंधन ने क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया।
- अप्रसार संधि (NPT), 1968 और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT), 1996 जैसी प्रतिबंधात्मक संधियों पर हस्ताक्षर करने के दबाव का सामना करते हुए, भारत ने पूर्ण शस्त्रीकरण का निर्णय लिया।
- ऑपरेशन शक्ति (पोखरण-II) के तहत, भारत ने मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण किये, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने औपचारिक रूप से भारत को एक परमाणु शस्त्र संपन्न राज्य घोषित किया।
- राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस प्रतिवर्ष 11 मई को ऑपरेशन शक्ति (पोखरण-II) के स्मरण में मनाया जाता है।
- स्थापित शक्ति (1998–वर्तमान): भारत ने वर्ष 1999 में अपना परमाणु सिद्धांत तैयार किया और वर्ष 2003 में इसे आधिकारिक रूप से कार्यान्वित किया, जिसमें उसकी “नो फर्स्ट यूज़” (NFU) पॉलिसी और विश्वसनीय न्यूनतम विरोध स्थापित किया गया।
- बाद में, भारत NPT के बाहर रहने के बावजूद, ऐतिहासिक भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता, 2008 और परमाणु आपूर्तिकर्त्ता समूह (NSG) से एक अद्वितीय छूट प्राप्त करके वैश्विक परमाणु व्यापार में सफलतापूर्वक एकीकृत हो गया।
वैश्विक परमाणु संधियों पर भारत का रुख
- NPT और CTBT: भारत ने अप्रसार संधि (NPT) या व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं।
- इसका तर्क है कि NPT संरचनात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि यह केवल क्षैतिज प्रसार पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि मान्यता प्राप्त परमाणु राज्यों द्वारा ऊर्ध्वाधर प्रसार को अनदेखा करती है।
- निर्यात नियंत्रण व्यवस्था: भारत का उत्तरदायी ट्रैक रिकॉर्ड के कारण इसके पास चार बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में से तीन की सदस्यता है: मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR), वासेनार व्यवस्था और ऑस्ट्रेलिया समूह।
- यह परमाणु आपूर्तिकर्त्ता समूह (NSG) में सदस्यता के लिये सक्रिय रूप से प्रयासरत है।
- परमाणु शस्त्रों के प्रतिबंध की संधि, 2017 (TPNW): भारत TPNW का विरोध करता है क्योंकि इसमें परमाणु आयुधों के लिये एक व्यापक सत्यापन व्यवस्था का अभाव है।
